भाव शैली सन्निवेश पूर्वक संप्रेषित होने की व्यवस्था है। इसलिए दर्शन क्षमता को विकसित करने के लिये और अभिव्यक्ति एवं संप्रेषित करने के लिए भाषाई अनुशासन एक अपरिहार्य शर्त है।
अनुभव के साथ ही दृष्टियों की क्रियाशीलता एवं प्रभावशीलता का होना पाया जाता है। मानव मात्र में 6 प्रकार की दृष्टियाँ क्रियाशील एवं प्रभावशील होना पाया जाता है। उसी के आधार पर अनुभव भास आभास प्रतीति एवं अनुभूति क्षमताएं अपने आप में स्पष्ट हो जाती हैं। साथ ही दृष्टियों के आधार पर ही शक्तियों का नियोजन होने के कारण स्वभावों का और इन्हीं दृष्टियों की क्रियाशीलता के आधार पर वृत्ति, प्रवृत्ति एवं निवृत्ति का स्पष्ट हो जाना पाया जाता है। छ दृष्टियां, इस प्रकार हैं - प्रियाप्रिय, हिताहित, लाभालाभ, न्यायान्याय, धर्माधर्म एवं सत्यासत्य। जीवन संचेतना में ये दृष्टियां क्रियाशील होता हुआ देखा जाता है। संचेतना जिन दृष्टियों को श्रेष्ठ अथवा अति आवश्यक समझती है उनमें वह दृष्टियां अपनी क्रियाशीलता में प्रभावशील हो जाती हैं। दृष्टियों की क्रियाशीलता का तात्पर्य उन उन वस्तुओं को पहचानने से है। प्रभावशील होने का तात्पर्य उसका निर्वाह करने से है।
प्रियाप्रिय दृष्टि इन्द्रिय सन्निकर्ष में होने वाली रुचियां और ऋतु प्रभावों को पहचानने और इच्छा पूर्वक सेवन करने, अनिच्छा होते पर न सेवन करने के स्वरूप में देखा जाता है। रुचियां इन्द्रिय सन्निकर्ष की सीमा में अर्थात्, रुप, रस, गंधेंद्रियों के सन्निकर्ष में अथवा योग में आने वाले जितनी भी वस्तुएं हैं उन सबमें से रुचि को आस्वादन करने की प्रक्रिया है, वह प्रिय की सीमा में और जो आस्वादन करने योग्य नहीं है की पहचान है वह अप्रिय की गणना में आता है।
"रुचि का तात्पर्य विभिन्न रसायनों के रस की पहचान।” पहचानने के क्रम में विभिन्न वस्तुओं को, अर्थों को विभिन्न पद्धति से पहचाना जाता है। एक पदार्थ पिण्ड के रुचि को पहचानने के लिये जिह्वा इंद्रियाँ, उसकी मृदुता कठोरता को पहचानने के लिये स्पर्श इंद्रियां, शब्दों को एवं उसके अर्थ को पहचानने के लिये कर्णेन्द्रियों द्वारा, गन्ध को ग्रहणेन्द्रिय द्वारा और रूप को नेत्र इंद्रिय द्वारा पहचाना जाता है। प्रत्येक इंद्रिय इच्छाओं सहित आशा से संपृक्त रहना आवश्यक है। इच्छा और आशा का प्रभावशीलन जिन जिन इंद्रियों में नहीं होता है अथवा होने योग्य नहीं रह पाती उस उस स्थिति में उन-उन इंद्रियों द्वारा जो आस्वादन क्रिया होने की व्यवस्था है वह नहीं हो पाती इसे मनुष्यों में देखा जा सकता है, जिनका आँख, कान, नाक रोग ग्रस्त हो गया हो उस स्थिति में उन उन इंद्रियों से जो आस्वादन क्रिया होती है या होने की है, वह नहीं हो पाती। स्वस्थ मनुष्य भी अपेक्षाओं और आशाओं से अप्रभावित रखने पर भी उन उन इंद्रियों द्वारा उनमें होने वाली रुचियों का आस्वादन नहीं हो पाता जैसे भोजन करते समय में जिह्वा चापल्यता के साथ अथवा पहचान के साथ इच्छायें न रहते समय उस भोजन की रुचि समझ में नहीं आती इसी प्रकार प्रत्येक इंद्रियों के क्रिया अपार गति के साथ देखा जाता है। ऊपर कही हुई प्रत्येक स्थिति को प्रत्येक मनुष्य देखने योग्य है। देखने का तात्पर्य समझने से है। इंद्रिय का तात्पर्य इच्छानुसार द्रवित होने से है। द्रवित होने का तात्पर्य इच्छानुरूप कार्य करने से है। इसे प्रत्येक व्यक्ति के साथ परीक्षण और निरीक्षण पूर्वक देखा जा सकता है। इच्छानुरुप जब शरीर के अंग-प्रत्यंग कार्य नहीं कर पाते हैं तब उसे रोग मानकर चिकित्सा शुरू कर देते हैं। इसी भांति सभी दृष्टियों का वर्तमान विभिन्न पद्धतियों से परीक्षण पूर्वक सिद्ध हो जाता है।