“हिताहित दृष्टियां स्वास्थ्य सीमानुवर्ती होते हैं।” जैसे– आंख, कान, नाक आदि इन्द्रियों को प्रिय लगते हुए स्वास्थ्य की दृष्टि से अहित होने अर्थात् रोगों को उत्पन्न करने का कारण बन जाता है अर्थात् रोग के कारणभूत जितने भी प्रिय क्रियाकलाप हैं वे सब अहित के रूप में निरूपित, स्पष्ट एवं प्रमाणित होते हैं। इसे ऐसा समझना पर्याप्त है कि इंद्रिय सन्निकर्ष में जितने भी प्रिय क्रिया व्यापार होते हैं उन सबको भोग की संज्ञा से समझ लेने पर अतिभोग रोगकारी होता है। शरीर का रोगी होना जीवन शरीर के द्वारा प्रकाशित होने में अड़चन अवरोध होना है। मूलतः जीवन संचेतना का परावर्तन और प्रत्यावर्तन का माध्यम के रूप में शरीर की महत्ता होने के कारण इसे स्वस्थ रखने की अनिवार्यता है इसे कोई भी सामान्य समझ के रूप में साक्ष्यों को अतिरिक्त क्रिया-कलापों में भी देखा जा सकता है। जैसे- बिजली से विभिन्न प्रकार की प्रयोजन पाने के लिये विभिन्न यंत्रों को स्वस्थ रखने की आवश्यकता होती है। जैसे पंखा, कूलर, हीटर, बल्ब, पंप आदि इस उदाहरणों से यह स्पष्ट हो जाता है कि शरीर को स्वस्थ रखने की दृष्टि से प्रियात्मक दृष्टि संयत हो जाती है यह सांस्कृतिक कार्य प्रणाली का प्रारंभिक निष्कर्ष होगा।
लाभालाभ दृष्टि– लाभात्मक दृष्टि विशेषकर बाह्य वस्तुओं अर्थात्, प्रत्येक मनुष्य अपने से भिन्न वस्तुओं के साथ लाभालाभात्मक दृष्टि का प्रयोग करता है। लाभ की परिभाषा यही होती है कि “कम देना अधिक लेना।” परिभाषा स्वयं स्पष्ट है। इस दृष्टि से जब व्यवसाय करने जाता है, व्यापार करने जाता है तब ही इस दृष्टि का प्रयोग होना होता है। व्यवसाय कार्य को हम देखें तो व्यवसाय कार्य मनुष्य के द्वारा ही संपादित हो पाती है। सम्पूर्ण उत्पादन व्यवसाय की उपज होती है। सम्पूर्ण वस्तु उत्पादन के रूप में हम गणना करते हैं। और आवश्यकतानुसार उपयोगी माना जाता है। वह सब मनुषयेतर प्रकृति का ही रूपांतरित स्वरूप है। ऐसी व्यवसाय कार्य को उत्पादन, उद्योग कार्य, व्यवसाय कार्य कहा जाता है। उत्पादन उपयोगिता व कला मूल्य को मनुष्येत्तर प्रकृति पर स्थापित करने से होता है। जैसे लोहा आदि धातुओं को एकत्रित करना। लकड़ी आदियों से आवश्यकीय वस्तुओ को बनाना, खनिज द्रव्यों को उपयोगिता का स्वरूप देना, विभिन्न द्रव्यों को रासायनिक स्वरूप देना, यह सब व्यवसाय कार्य का तात्पर्य होता है। इसी में कलात्मक कार्य भी होते हैं जो उपयोगिता के जुड़ा होता है। यंत्रों उपकरणों के साथ जो कलायें जुड़ पाती हैं। ये हुआ उपयोगिता के साथ कला का योगदान। इसके अतिरिक्त मनुष्य में व्यवसाय का एक और भाग है, वह है कलात्मक व्यवसाय। व्यावसायिकता का तात्पर्य जीविकोपार्जन सहित कला की अभिव्यक्ति। इनमें यह गण्य होते हैं कि मूर्तिकला, चित्रकला, संगीत, काव्य और साहित्य होते हैं।
व्यवसाय व उत्पादन में अंतर यही है कि उत्पादन उपयोगिता प्रधान कला गौण। जिसमें सामान्य आंकाक्षावादी आहार आवास अलंकार द्रव्य के रूप में गण्य होते हैं और महत्वाकांक्षावादी उपयोगिता दूरगमन दूरश्रवण एवं दूरदर्शनवादी वस्तुयें उपकरण यंत्र होते हैं। अथवा इस रुप में गण्य होते हैं यह मनुष्य की आवश्यकताओं का स्वरूप है इन आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिये मनुष्य उत्पादन के लिये प्रवृत्त होता ही है। इस प्रकार उत्पादन उपयोगिता प्रधान अपने आप सिद्ध हुआ और व्यवसाय कला प्रधान तदुपरांत उपयोगिता गौण सिद्ध हुई। इसका मतलब यह हुआ कि एक भाग उपयोगिता पूर्वक कला प्रदान करना चाह रहा है दूसरा भाग कला पूर्वक उपयोगिता को उत्प्रेरित करना चाह रहा है। मूलतः कला और उपयोगिता अविभाज्य वर्तमान हैं। इसी कारणवश मानव अनादि काल से ही दोनों पद्धति से ही जूझ पड़ा है। यही संस्कृति की स्त्रोत के रूप में दिखाई पड़ता है। तात्पर्य कलात्मक उपयोगिता, उपयोगात्मक कला यह दोनों प्रयास सन्निकर्ष होने की क्रम में संस्कृति का उत्थान को लक्ष्य बना सकते हैं।