‘जीवन’ वस्तु को पहचानने के क्रम में भौतिकवादियों ने ‘शरीर रचना विशेष’ को ही ‘वस्तु’ मान लिया जबकि आदर्शवादियों ने ईश्वर अथवा आत्मा को वस्तु माना। पहले विधि से मनुष्य व्याख्यायित नहीं हो पाया। दूसरे विधि से रहस्य के अनंतर रहस्य ही दीवार बन गई। इसलिए ‘जीवन’, विशेषकर मानव जीवन अध्ययनगम्य नहीं हो पाई थी।

अस्तित्व में यह देखा गया है कि परमाणु में विकास होता है। विकास क्रम में ‘जीवन पद’ होता है। ‘जीवन’ पद के अनन्तर जागृति क्रम और जागृति ‘जीवन’ में ही होती है। इसे हम इस प्रकार देख पाते हैं कि सम्पूर्ण प्रजाति के परमाणुओं को कतार में रखकर देखने पर कुछ संख्यात्मक ही पाये जाने वाले परमाणु ‘भूखे’ रहते हैं क्योंकि उनमें और अंशों को समा लेने की प्रवृत्ति दिखाई पड़ती है, और कुछ संख्यात्मक प्रजाति के परमाणुएँ ‘अजीर्ण’ स्थिति में दिखाई पड़ते हैं क्योंकि उनसे कुछ अंश विसर्जित होने की प्रवृत्ति दिखाई पड़ती है। दिखने का अर्थ समझने से है। मनुष्य ही समझने वाला एक मात्र इकाई है। इसी आधार पर मनुष्य ही दृष्टा होना हम स्वीकार सकते हैं। हम ‘जीवन विद्या परिवार’ इसे समझकर स्वीकार कर चुके हैं। ‘दृष्टा पद’ में ही जीवन एक तृप्त परमाणु के रूप में समझ में आता है क्योंकि ‘भूखे’ और ‘अजीर्ण’ परमाणुओं के बीच ‘तृप्त’ परमाणु होना एक आवश्यकता है। यही तृप्त परमाणु जागृतिपूर्णता के अनंतर स्वयं को समझने और अस्तित्व को समझने के योग्य हो जाता है। यही अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन ज्ञान की स्पष्ट अभिव्यक्ति का आधार है।

ऐसे तृप्त परमाणु रूपी जीवन और शरीर के संयुक्त रूप में मनुष्य का होना पाया जाता है। इसलिए यहाँ मैं कहना चाहता हूँ कि मनुष्य नाम से जो कुछ भी समझने की बिन्दुएँ हैं, ‘जीवन’ ही समझता है, इसलिए दृष्टा, कर्ता और भोक्ता होता है। जीवन विहीन शरीर मनुष्य नहीं होता, शरीर विहीन जीवन भी मनुष्य के पद में नहीं होता। अतएव जीवन और शरीर के संयुक्त रूप में मानव परंपरा का होना देखा जा सकता है।

मानव परंपरा ही ज्ञानावस्था की इकाई है। ज्ञान मूलतः जीवन ज्ञान ही है। दर्शन, मूलतः अस्तित्व दर्शन ही है। सम्पूर्ण मानव के लिए ‘मानवत्व’ ही आचरण का आधार है। इस प्रकार जीवन ज्ञान ही परम ज्ञान, अस्तित्व दर्शन ही परम दर्शन एवं मानवीयतापूर्ण आचरण ही परम आचरण है क्योंकि यह सबकी आवश्यकता है। सर्वमानव की आवश्यकता है। यह सबको समझ में आने की संभावना है और इस स्पष्ट ज्ञान, दर्शन और आचरण के फलस्वरूप अखंड समाज- सार्वभौम व्यवस्था समीचीन है।

इस पूर्व भूमि के आधार पर जीवन विद्या के सामान्य अवधारणाओं की ओर आपका ध्यानाकर्षण करना चाहते हैं इसमें परिशीलन (परीक्षणपूर्वक स्वीकारना) के लिए आवश्यक है कि स्वयं ही, स्वयं का, स्वयं के लिए परीक्षण करें। यही प्रमुख बिन्दु है। इस स्थिति में जीवन के स्वरूप को गठनपूर्ण तृप्त परमाणु के रूप में समझ पाते हैं। ऐसे तृप्त परमाणु में अक्षय बल और अक्षय शक्तियों को समझना सहज है। जैसे प्रत्येक व्यक्ति अपने में आशा, विचार, इच्छा, संकल्प और अनुभव करता ही है। ये पांचों शक्तियाँ कितनी भी परावर्तित किया जाए, और परावर्तित करने के लिए शक्तियाँ उद्गमित होता हुआ देखने को मिलता है। दूसरे क्रम में कितने भी आशा के अनंतर और आशा हम प्रत्येक व्यक्ति कर सकते हैं। इसे प्रत्येक व्यक्ति अनुभव कर सकता है, सत्यापित कर सकता है। इसी प्रकार विचार, इच्छा, संकल्प और अनुभव को भी अक्षय रूप में पाते हैं।

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