लाभ का अंत भोग अतिभोग और बहुभोग की ओर होने के कारण इसे मानव चरित्र का आधार होना संभव नहीं है। इस प्रकार लाभवाद का पराभव तो हमें पता लगता है लाभवाद विशेषकर व्यवस्था व व्यापार का संयुक्त देय है। इन्हीं दो पक्षों का संयुक्त प्रयास आज मानव चरित्र के सम्मुख प्रश्न चिन्ह लगवा दिया। इसके साथ यह भी तथ्य अपने सम्मुख आ चुके हैं कि उपासना पूजा प्रार्थनावादी चरित्र शिक्षा और व्यवस्था नहीं हो सकती। जब तक शिक्षा व्यवस्था और चरित्र में अविभाज्य वर्तमान जब तक स्थापित नहीं हो पायेगा तब तक मानव कुल इन मुद्दों के संबंध में बारम्बार सोचने के लिये बाध्य होता ही रहेगा। यह कोई भविष्यवाणी या चमत्कार नहीं है। यह सहज स्वाभाविक नियति क्रम व्यवस्था है। नियति क्रम व्यवस्था से परे जाकर अर्थात् उसके व्यतिरेक में अथवा विपरीत में प्रयास करते हुए सामाजिक आर्थिक राज्यनैतिक सफलता नहीं हो पाती। इनमें परस्पर दूरियाँ रह जाती हैं वे ही द्रोह विद्रोह का मुद्दा बनते हैं। द्रोह विद्रोह मानव का इष्ट तीनों काल में नहीं हो पाता अर्थात् मानव सदा के लिये वर नहीं पाया अथवा वर नहीं पायेगा। इस स्थिति में सहज ही यह मालूम होता है कि द्रोह विद्रोह विहीन अर्थात् शोषण विहीन व्यवस्था शिक्षा एवं चरित्र का संयोजन है। इस प्रकार से इस निष्कर्ष पर हम आ सकते हैं कि लाभोन्मादी अर्थव्यवस्था शोषण के बिना, शोषण द्रोह विद्रोह के बिना, द्रोह-विद्रोह युद्ध के बिना, युद्ध मानव कुल के नाश के बिना रुक नहीं पाता।

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