3. जीवन विद्या (क्र. ३)
दिनांक-06/03/89
अस्तित्व में जीवन विद्या का स्वरूप, जीवन-जागृति लक्षित अभ्यास की परिस्थिति, स्थिति व गति आवश्यकता, संभावना, प्रक्रिया, स्रोत एवं प्रयोजनपूर्वक है।
परिस्थितियाँ :- अस्तित्व में हमें जीवन जागृति लक्षित अभ्यास के लिए निम्नलिखित परिस्थितियाँ बाध्य कर रही हैं।
विभिन्न अभ्यास परंपरा स्वयं तथा उनकी परस्परता में अंतर्विरोध होना।
मनुष्य के अनुभव बल, विचार शैली तथा जीने की कला में अंतर्विरोध होना।
- ध्यान, ध्येय व ध्याता में अंतर्विरोध होना।
- दृष्टा, दृश्य व दर्शन में अंतर्विरोध होना।
- अभ्यास, उसका परिणाम, फल एवं प्रभाव का शिक्षा व व्यवस्था से सूत्रित व व्याख्यायित न होना।
- उपर्युक्त सभी परिस्थितियाँ विकल्प के लिए प्रेरक हैं।
- <strong>सूत्र</strong> – प्रत्येक मनुष्य शुभ चाहता है; रुचि से ग्रसित रहता है।
स्थिति व गति :- अस्तित्व में जीवन जागृति प्रत्येक मनुष्य में, से, के लिए सहज स्थिति व गति है।
जीवन विद्या = जीवन जागृति = अस्तित्व में अनुभूति = प्रखर प्रज्ञा = प्रामाणिकता = जानना + मानना = स्थिति/ समाधान = सम्बन्धों को पहचानना + निर्वाह करना = गति प्रामाणिकता (जानने व मानने) में, से, के लिए सम्पूर्ण वस्तु
अस्तित्व, अस्तित्व में विकास, अस्तित्व में जीवन, अस्तित्व में जीवन जागृति तथा अस्तित्व में रचनाएँ ही हैं। समाधान में, से, के लिए सम्पूर्ण गति के लिए क्षेत्र मानवीय तथा नैसर्गिक सम्बन्धों को पहचानना और मूल्यों का निर्वाह करना ही है। प्रत्येक मनुष्य कर्म-स्वतन्त्रता व कल्पनाशीलता जैसी मौलिक वैभव सहित स्थिति व गति में दृष्टव्य है। यही मौलिकता बहु-आयामों में प्रवर्तन का स्रोत होना सर्वेक्षण पूर्वक सम्पूर्ण देश काल में स्पष्ट होता है। बहुआयामी प्रवर्तन क्रम में, कर्म व कल्पना की तृप्ति बिन्दुओं का अन्वेषण समाहित है ऐसी तृप्ति बिन्दुओं का स्वरूप प्रामाणिकता व समाधान जो स्वयं जीवन जागृति की अभिव्यक्तियाँ हैं। अस्तु जीवन जागृति ही अभ्यास का सार्वभौम उद्देश्य है।