सूत्र:- जीवन में जागृति, नियति-क्रम व्यवस्था है इसलिए उसकी पीड़ा नियति सहज है, यही नित्य संभावना है।

आवश्यकता:- अस्तित्व में जीवन जागृति का साक्ष्य एक सार्वभौम आवश्यकता है।

मानव में, से, के लिए –

समाधान, समृद्धि, अभय व सहअस्तित्व की आवश्यकता है।

  • प्रामाणिकता व प्रमाण की आवश्यकता है।
  • जीवन-जागृति की आवश्यकता है।
  • अनुभव बल, विचार शैली व जीने की कला में सामरस्यता की आवश्यकता है।
  • ध्यान, ध्येय व ध्याता में सामरस्यात्मक स्थिति व गति की आवश्यकता है।
  • दृष्टा, दृश्य व दर्शन में निर्भ्रमता की आवश्यकता है। 
  • अभ्यास, व्यवस्था व शिक्षा में सामरस्यता की आवश्यकता है।
  • शिक्षा व्यवस्था व आचरण में सामरस्यता की आवश्यकता है।
  • अस्तित्व और अस्तित्व में जड़ चैतन्यात्मक प्रकृति का अंतर्सम्बन्धों के प्रति निर्भ्रम होना आवश्यक है।
  • इस प्रकार साम्य रूप में अभ्यास की सार्वभौम आवश्यकताएँ स्पष्ट हैं।

सूत्र :- जीवन तृप्ति व व्यवहार गति नित्य आवश्यकता 

संभावना :-

अस्तित्व में जीवन जागृति की संभावना सहज है।

प्रत्येक मनुष्य में जीवन-जागृति, तृप्ति (प्रामाणिकता) व समाधान की संभावना के रूप में ही विद्यमान है।

  • प्रत्येक मनुष्य में जीवन जागृति विश्राम की संभावना के रूप में विद्यमान है।
  • प्रत्येक मनुष्य में जीवन जागृति सार्वभौम व्यवस्था की संभावना के रूप में विद्यमान है।
  • प्रत्येक मनुष्य में जीवन जागृति स्वतन्त्रता व स्वराज्य की संभावना के रूप में विद्यमान है।
  • जीवन जागृति की सम्पूर्ण संभावनाओं का आधार अस्तित्व है एवं अस्तित्व में मानव ही है। मानव सर्वाधिक विकसित प्रकृति है। इसकी मौलिकता कर्म-स्वतन्त्रता और कल्पनाशीलता के रूप में स्पष्ट है। ऐसी मौलिक स्थिति व गति सहज रूप में क्रमशः अप्राप्ति की प्राप्ति, अज्ञात का ज्ञात सम्पन्न होने में है।
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