जीवन विद्या
1. जीवन विद्या (क्र. १)
-सम्पूर्ण समाधान का स्त्रोत-
हर मनुष्य जीवन और मनुष्य का नाम लेता है। मनुष्य का सर्वेक्षण करने पर पता लगता है - मनुष्य स्वयं को जानने में ही संदिग्ध या अस्पष्ट रहता है। हर मनुष्य स्वयं के अस्तित्व को मानता है जानता नहीं इसीलिए स्वयं के प्रति विश्वास नहीं हो पाता है। फलस्वरूप श्रेष्ठता का मूल्यांकन में भ्रमित होना पाया जाता है।
मनुष्य का स्व-मूल्यांकन पूर्वक ही हर मनुष्य का मूल्यांकन संभव है। स्व-मूल्यांकन के लिए मानवत्व के आधार पर एकता को सर्वोतोमुखी समाधान के आधार पर मनुष्य जाति एवं मनुष्य धर्म की समानता से सार्वभौमता को जानना मानना जरूरी है। मनुष्य अनेक समुदायों में बंटने का फल ही है आज की सभी प्रकार की समस्यायें। मनुष्य जाति की एकता को हर मनुष्य में पाये जाने वाली जीवन सहज रूप में जानने, मानने, पहचानने निर्वाह करने के क्रियाकलापों के आधार पर प्रमाणित होता है। बच्चे, बड़े, बूढ़े, जवान सभी इन क्रियाओं को करते हुआ देखने को मिलते हैं। जानने–मानने की वस्तुएं अस्तित्व स्वयं सहअस्तित्व होना वर्तमान है। वर्तमान ही नित्य प्रमाण है। परमात्मा में ओत प्रोत प्रकृति एक दूसरे की पूरकता के रूप में है। ऐसा प्रकृति जड़ चैतन्य जिसमें से मनुष्य चैतन्य प्रकृति में विकसित पद में है। मनुष्य ही अस्तित्व में दृष्टा पद में होने के कारण अर्थात् समझने की अधिकार संपन्न होने का प्रमाण जानने मानने के रूप में है।
मनुष्य ही जानने-मानने के क्रम में जीवन क्रियाकलापों को भी जानना मानना एक सहज प्रक्रिया है। जीवन सहज अक्षय अपार शक्तियाँ और उसके प्रभाव के आधार पर प्रत्येक मनुष्य जीवन को सरलता से समझने योग्य है। जीवन को तात्विक रूप में, क्रिया रूप में एक प्रयोजन रूप में देखा जाता है। तात्विक रूप में जीवन विकसित गठनपूर्ण परमाणु है। इसका विशद अध्ययन परमाणु में विकास खंड में स्पष्ट किया है। फिर भी संक्षेप रूप में संपूर्ण विकास परमाणु में ही होता है। विकासक्रममें ही संपूर्ण प्रजाति के परमाणु विद्यमान हैं। विकसित परमाणु जीवन पद में संक्रमित हो जाता है। वह पुनः भौतिक या रासायनिक अणु में परिवर्तित किसी भी प्रभाव या दबाव से नहीं हो पाता है। इसीलिए जीवन अमर होना स्पष्ट होता है। अणु रचित रचनाओं का विरचना का होना पाया जाता है। शरीर भी रसायनिक तत्वों, द्रव्यों का संरचना है। इसीलिए शरीर का नश्वरत्व भी समझ में आता है।
प्रत्येक मनुष्य जीवन और शरीर का संयुक्त रूप में है। जीवन ही शरीर को जीवन्तता प्रदान करता है और जीवन सहज लक्ष्य जागृति को प्रमाणित करने के क्रम में शरीर के द्वारा जीवन प्रकाशित होता ही रहता है। इसका पहला प्रमाण - हर एक व्यक्ति कर्मस्वतंत्र कल्पनाशील होना, दूसरा प्रमाण - जानना, मानना, पहचानना, निर्वाह करना, तीसरा प्रमाण - चयन-आस्वादन करना, विश्लेषण और तुलन करना, चित्रण और चिंतन करना, संकल्प और बोध करना, प्रामाणिकता और अनुभव करना, जीवन सहज क्रियाकलाप हैं। इन्हीं का विशद अध्ययन अवधारणा और प्रमाणित करने के क्रियाकलाप को जीवन विद्या के नाम से जाना जाता है।