आदिकाल से भी स्वस्वरूप को समझने के लिए अभीप्सायें रही हैं। आत्मज्ञान के बारे में भी प्रेरणा रही है। ब्रह्मज्ञान को ज्ञान मान कर ही सारे आध्यात्म चर्चा की गई है। उस चर्चा में आत्मज्ञान किसको होता है यह पता नहीं चला, ब्रह्मज्ञान किसको होता है यह भी पता नहीं चला। इसलिए परेशानियाँ और बढ़ी। आत्मधर्म और ब्रह्मज्ञान अध्ययनगम्य नहीं हो पाया। प्रयोग सतत चलता ही आई। अभी हम जीवनज्ञान और धर्म अखंड समाज सार्वभौम व्यवस्था को सुगमता से अध्ययन कर सकते हैं। अस्तित्वमूलक मानवकेंद्रित चिंतन विधि से व्यापक सत्तामयता में संपृक्त जड़ चैतन्य प्रकृति का ज्ञान अर्थात् जानना मानना बनता है। जानने-मानने वाला जीवन सहज क्रिया है। जीवनज्ञान के लिए विधिवत अध्ययन और अवधारणा की आवश्यकता है ही।
जीवन का अध्ययन क्रम में निरीक्षण परीक्षणपूर्वक चयन और आस्वादनों को विश्लेषण और तुलन से परखा जाता है फलस्वरूप न्याय-अन्याय, समाधान-समस्या हमें समझ में आता है। तुलन और विश्लेषण, चिंतन और चित्रण द्वारा परखा जाता है। फलस्वरुप न्याय और समाधान स्पष्ट हो जाता है। चिंतन और चित्रण को बोध और संकल्प से परखा जाता है फलतः समाधान और सत्य समझ में आता है। बोध और संकल्प को प्रामाणिकता और अनुभव से परखा जाता है। फलस्वरूप अवधारणागत (बोध सहज) सत्य प्रमाणित हो जाता है। इसी क्रम में आत्मा अस्तित्व में अनुभूत होना, अध्ययनपूर्वक और अभ्यासपूर्वक प्रमाणित होती है। अस्तित्व ही परम सत्य है। अस्तित्व में अनुभूत होना जीवन जागृति सहज अधिकार है। यही दृष्टा पद प्रतिष्ठा का प्रयोजन है।
जानने-मानने में जब जीवन और अस्तित्व तृप्त हो जाता है उसके फलन में संबंधों, नैसर्गिकताओं और व्यवस्था को पहचानना, निर्वाह करना सहज होता है। अस्तित्व स्वयं सहअस्तित्व होने के कारण इस धरती पर चारों अवस्था के अभिव्यक्तियाँ परस्पर संबंधित है ही। इन संबंधों को दो भाग में पहचाना जाता है कि (1) प्राकृतिक संबंध (2) मानव संबंध। मानव संबंधों को पहचानते ही मूल्यों का निर्वाह होना सहज है। संबंधों का नामकरण सहज रूप में ही मानव प्रकारांतर से शब्दों के रूप में उच्चारण करता ही है।