2. जीवन विद्या (क्र. २)

जीवन विद्या - अवधारणा

मूलतः जीवन विद्या और उसकी अवधारणा का स्रोत अस्तित्वमूलक मानव केन्द्रित चिंतन और उसकी अभिव्यक्ति है। यह मानव परंपरा में, से, के लिए अर्पित है।

‘अस्तित्व’ में मैं अनुभूत हुआ हूँ। अनुभव को बोधपूर्वक संप्रेषित किया हूँ और अस्तित्व में मैं अपने ही जागृतिपूर्णता को प्रमाणित कर रहा हूँ। मैं अपने दृष्टापद प्रतिष्ठा और उसके प्रयोजनों को पहचाना हूँ। अस्तित्व में मानव को अविभाज्य रूप में होना पाता हूँ।

अस्तित्व का तात्पर्य नित्य वर्तमान है। वर्तमान का तात्पर्य ‘होना’ ही है। जैसे आप-हम, धरती, अनंत का होना और व्यापक का होना हम देखते हैं। हम एक दूसरे को देखने में बीच में व्यापक वस्तु दिखाई पड़ती है। इसी व्यापक वस्तु में आप-हम, यह धरती, चाँद-सूरज, तारागण अनंत सौरव्यूह समाया हुआ दिखता है।

इस समाए हुए का स्वरूप ही सम्पूर्ण एक-एक, चाहे परमाणु हो, चाहे ग्रह-गोल-सौर व्यूह हो, सभी इसी व्यापक वस्तु में घिरे, डूबे और भीगे दिखते हैं। वस्तु का तात्पर्य वास्तविकता को (जैसा है वैसा ही) प्रकाशित करने से है। इस प्रकार व्यापक वस्तु अपने वास्तविकता को और विभक्त वस्तु अपने वास्तविकता को प्रकाशित कर रहे हैं। यही अस्तित्व का मूल अवधारणा है।

‘व्यापक’ वस्तु में विभक्त वस्तुएँ भीगे रहने का प्रमाण उनका ऊर्जा सम्पन्न रहना हैं। ऐसी ऊर्जा संपन्नता, बल संपन्नता के रूप में स्पष्ट है। ऐसी बल संपन्नता क्रियाशीलता और क्रियाशीलता श्रम, गति, परिणाम के रूप में दिखती है। इसी के साथ-साथ घिरा हुआ से नियंत्रण, डूबा हुआ से क्रियाशीलता निरंतर देखने से मिलती है। यही सह अस्तित्व का अवधारणा है।

अस्तित्व सहज सह अस्तित्व ही इस धरती पर वैभवित है। इसे हम पदर्थावस्था, प्राणावस्था, जीवावस्था और ज्ञानावस्था के रूप में देखते हैं। इसमें से मनुष्येतर तीनों अवस्था की प्रकृति संतुलित, नियंत्रित और नियमित रहना पाया जाता है। यही इनके व्यवस्था में रहने का एवं समग्र व्यवस्था में भागीदार होने का साक्षी है। इन तत्वों की विशेष व्याख्या न करते हुए मैं मानव को अध्ययन के वस्तु के रूप में प्रस्तुत करना चाहता हूँ।

मनुष्य अस्तित्व में अविभाज्य है। सहअस्तित्व प्रभाव में ही अस्तित्व दिखाई पड़ती है, इसलिए मनुष्य भी सहअस्तित्व प्रभाव में है। मनुष्य का मूल स्वरूप ही ‘जीवन’ और शरीर के सहअस्तित्व में वैभवित है। जिसमें से शरीर रासायनिक भौतिक रचना के रूप में होना सर्वविदित है। जिसमें 5 कर्मेन्द्रियाँ एवं 5 ज्ञानेंद्रियाँ होना स्पष्ट है। इसके लिए आवश्यकीय सभी अंग-अवयव शरीर रचना ज्ञान में स्पष्ट हो चुका है।

Page 58 of 106
54 55 56 57 58 59 60 61 62