इसी अक्षयता को पहचानने के साथ-साथ सार्थकता की कसौटी अपने आप मानव के सामने आता है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति सफल होना चाहता है। इस आशय के साथ सफलता के ध्रुव बिन्दु को भी पहचानना अनिवार्य है। प्रत्येक मनुष्य में होने वाली जीवन क्रियाएँ सहज रूप में ही चयन, आस्वादन, विश्लेषण, तुलन, चित्रण, चिंतन, संकल्प, बोध, प्रामाणिकता और अनुभव के रूप में सतत होता ही रहता है।

मानव परंपरा में सार्थकता को समाधान, समृद्धि, अभय और सहअस्तित्व के रूप में पहचाना गया है। इसकी सार्वभौमता को सम्पूर्ण मानव स्वीकारता ही है। इन सर्वशुभ बिन्दुओं को सफल और सर्वसुलभ होने की दिशा में ही जागृति और अजागृति की रेखा स्पष्ट हुई है। जागृत मानव परंपरा में ही हम जागृत संतानों को देखने का सौभाग्य सहज है। भ्रमात्मक (अजागृत) कार्यकलाप को प्रिय, हित और लाभ दृष्टि से अनुप्राणित चयन, आस्वादन, विश्लेषण और चित्रण क्रियाकलाप के रूप में पहचाना जाता है। जबकि न्याय, धर्म और सत्यपूर्ण दृष्टि से अनुप्राणित चयन, आस्वादन, विश्लेषण, चित्रण, चिंतन, संकल्प, बोध, प्रामाणिकता और अनुभव ही जागृति का प्रमाण है। इस प्रकार जागृतिपूर्वक ही स्वायत्त मानव और परिवार मानव के रूप में स्पष्ट होना पाया जाता है। फलतः परिवार मूलक स्वराज्य इसी देश- धरती में प्रमाणित होना एक मानव सहज आवश्यकता, संभावना और उपलब्धि है। मेरी दृष्टि में यही सर्वोदय है, अभ्युदय है, यही स्वतन्त्रता भी है।

जय हो! मंगल हो!! कल्याण हो!!!

  

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