इस प्रकार उपर्युक्त तथ्यों का सार्वभौम होने के कारण, जीवन- जागृति सबका इष्ट है।

सूत्र :- नियति नित्य प्रभावशील है, यही जागृति का स्रोत है।

प्रयोजन :- अस्तित्व में जीवन विद्या का प्रयोजन जीवन जागृति ही है।

जीवन जागृति में आनंद (प्रामाणिकता) आत्मा में,

  • जीवन जागृति में बोध (समाधान) बुद्धि में,
  • जीवन जागृति में चिंतन (न्याय) चित्त में,
  • जीवन जागृति में तुलन (नियम) वृत्ति में,
  • जीवन जागृति में आस्वादन (मूल्य) मन में,
  • अभिव्यक्त, संप्रेषित व प्रकाशित होता है अतः अभ्यास का सम्पूर्ण प्रयोजन व्यवहार सुलभ हो जाता है।

अस्तु, ध्यान प्रक्रिया प्रत्येक मनुष्य के प्रबुद्धता व मेधाविता क्रम में कितना आवश्यक, अनिवार्य व अपरिहार्य है, यह स्पष्ट हो चुका है। ध्यान का ध्येय अस्तित्व में अनुभूति ही है। ध्याता स्वयं जीवन है, दृष्टि जीवन जागृति क्रम में अभिव्यक्त व संप्रेषित होने वाला न्याय, धर्म (समाधान) व सत्य (प्रामाणिकता) है इसलिए वह सार्वभौम है। अस्तित्व में अनुभूति ही जीवन-जागृति एवं उसकी निरंतरता है। जीवन-जागृति ही सम्पूर्ण आयाम , कोण, दिशा, और परिप्रेक्ष्य में समाधान उसकी निरंतरता व परंपरा है। इसे प्रत्येक देश, काल में मनुष्य बरता है।

अस्तित्व में अनुभवमूलक , जीवन-विद्या के प्रकाश में दृष्टा, दृश्य एवं दर्शन में सामरस्यता, अनुभव बल, विचार शैली एवं जीने की कला में सामरस्यता; व्यक्ति, परिवार , समाज (मानव इकाई) राष्ट्र और अंतर्राष्ट्र में सामरस्यता; व्यवसाय, व्यवहार, विचार व अनुभूति में सामरस्यता एवं सौन्दर्य बोध; व्यक्तित्व में सामरस्यता, सहज सुलभ होगी।

सूत्र :- परिणाम का अमरत्व, श्रम का विश्राम तथा गति का गंतव्य ही अस्तित्व में प्रयोजन है।

जीवन जागृति क्रम में प्रामाणिकता व समाधान सार्वभौम होने के कारण, जीवन विद्या मूलक, जीवन- जागृति लक्षित अभ्यास का लोक व्यापीकरण सहज है। अस्तु यह जीवन-मूलक अभ्यास सुखद, सुंदर एवं कल्याणमय होने की कामना से अर्पित है।

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