जीवन जागृति लक्षित जीवन विद्या का प्रयोग और मूल्यांकन सूत्र-

जीवन विद्या का लक्ष्य – जीवन जागृति – सर्वतोमुखी समाधान

प्रयोग:

  • जीवन विद्या को प्रबोधनपूर्वक बोधगम्य कराना
  • इंद्रिय सन्निकर्षात्मक सम्पूर्ण कार्य व्यापार के रुचि मूलक होने की वास्तविकता को बोधगम्य करना।
  • मूल्य मूलक प्रणाली को बोध सुलभ कराना, जीवन तृप्ति के लिए उसकी अपरिहार्यता को बोध कराना।
  • मूल्य जीवन सहज और रुचियाँ इंद्रिय सहज होने की यथार्थता को बोधगम्य कराना।
  • मूल्यों के आस्वादन क्रम में सम्बन्धों की पहचान व मूल्यों का निर्वाह करने की सहजता को बोध गम्य कराना।
  • मूल्यों का व्यवहार में सम्पन्न कराना, इस क्रिया को वही करेगा, जो प्रबोधन कर्ता है।
  • प्रबोधन कर्ता, जीवन विद्या को जीते हुए प्रबोधन व मूल्यांकन करेगा।
  • न्यायान्याय, धर्माधर्म व सत्यासत्य को विश्लेषण पूर्वक बोध गम्य कराना।
  • मानव मूल्यों को व्यवहार रूप देने की प्रक्रिया व प्रणाली को बोधगम्य कराना।
  • मानव मूल्यों का स्वरूप जो धीरता , वीरता व उदारता है उसे व्यवहार, प्रयोजन के रूप में और विचार प्रयोजन के रूप में बोधगम्य कराना।
  • मानव अपने “त्व” सहित व्यवस्था है , को बोधगम्य कराना।
  • जीवन का अमरत्व, शरीर का नश्वरत्व एवं व्यवहार के नियमों को विवेचनापूर्वक बोधगम्य कराना।
  • मूल्यांकन विधि से विचार व व्यवहार का मूल्यांकन कराना।
  • दया, कृपा व करुणा का व्यावहारिक प्रयोजन के प्रति निर्भ्रम अवधारणाओं को स्थापित कराना।
  •  जाने हुए को मानने व माने हुए को जानने के क्रम में प्रामाणिकता; प्रत्येक व्यक्ति में, से, के लिए स्वत्व होने के सत्य को प्रबोधन कराना।
  • जीवन जागृति ही अभिव्यक्ति में प्रमाण होने के सत्य को प्रबोधन कराना।
  • अस्तित्व, अस्तित्व में विकास, जीवन, जीवन-जागृति और रचनाएँ अध्ययन के सम्पूर्ण वस्तु होने के सत्य को प्रबोधित कराना।
  • जीवन जागृति को सर्वोच्च विकास होने के सत्य को प्रबोधित कराना।
  • जीवन जागृति, प्रत्येक व्यक्ति में , से, के लिए समीचीन होने के सत्य को प्रबोधित कराना।

मन, बुद्धि, चित्त, वृत्ति और आत्मा का अविभाज्य वर्तमान ही जीवन है। प्रत्येक मनुष्य में जीवन आशा, विचार , इच्छा व संकल्प और अनुभव जैसे अक्षय बल सम्पन्न है।

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