• अस्तित्व ही परम सत्य है;
  • अस्तित्व न घटता है, न बढ़ता;
  • जो था , वही होता है।

मानव जीवन का सम्पूर्ण स्वरूप अनुभव बल, विचार शैली व जीने की कला है। वस्तु में भाव अविभाज्य वर्तमान है। व्यवस्था ही सार्वभौम उद्देश्य, आदर्श और लक्ष्य है।

मूल्यांकन: - 

औसत मनुष्य का मूल्यांकन मानवीयता पूर्ण मनुष्य

  • न्याय, धर्म, सत्य दृष्टियों की क्रियाशीलता 
  • धीरता, वीरता, उदारतापूर्ण स्वभाव
  • वित्तेषणा प्रधान, पुत्रेषणा, लोकेषणात्मक विषय में प्रवृत्ति व प्रवर्तन – मानवीयतापूर्ण श्रेष्ठ मनुष्य
  • सत्य, धर्म, न्यायपूर्ण दृष्टि की प्रखर क्रिया-शीलता
  • वीरता, उदारता, धीरता क्रम में स्वभावों की अभिव्यक्ति व संप्रेषणा
  • वित्तेषणा, पुत्रेषणा, लोकेषणा क्रम में प्रवृत्तियाँ व प्रवर्तन
  • मानवीयतापूर्ण श्रेष्ठतर मनुष्य
  • सत्य, धर्म, न्यायपूर्ण दृष्टियों की प्रखर क्रियाशीलता 
  • उदारता प्रधान वीरता धीरता क्रम में स्वभावों की अभिव्यक्ति व संप्रेषणा
  • लोकेषणा प्रधान वित्तेषणा, पुत्रेषणा क्रम में प्रवृत्तियाँ व प्रवर्तन
  • मानवीयता सहित श्रेष्ठतम मनुष्य (देव मानव)
  • सत्य एवं धर्म दृष्टियों की जागृत।
  • दया, उदारता व वीरता क्रम में मूल्यों की अभिव्यक्ति।
  • लोकेषणात्मक विषय प्रवृत्ति व प्रवर्तन।
  • दिव्य मानव
  • सत्य पूर्ण दृष्टि की पूर्ण जागृति
  • दया, कृपा व करुणा क्रम में मूल्यों की अभिव्यक्ति व संप्रेषणा।
  • सत्य (अस्तित्व) शून्य में प्रवृत्ति व प्रवर्तन (लक्ष्य)
  •   
Page 66 of 106
62 63 64 65 66 67 68 69 70