5. जीवन विद्या (क्र. ५)

22 - Nov. 91. 

अस्तित्व ही सहअस्तित्व, विकास जीवन जीवन जागृति, रासायनिक भौतिक रचना विरचना, पूरकता वर्तमान है यही समझदारी है।

मानव कृत – उच्च शिक्षा का भूमिका

मानव अपनी संपूर्णता में जीवन और शरीर का संयुक्त साकार रूप है। शरीर सम्बन्धी विश्लेषण यहां संक्षिप्त है, अपितु शरीर का प्रयोजन या उपयोग जीवन के लिए क्या है, इतने को ही आगे स्पष्ट किया गया है। 

जीवन के आधार पर ही मनुष्य की महिमा, गरिमा और कार्य स्पष्ट होना ही “जीवन विद्या” है। यह मूलत: जीवन-ज्ञान ही है। चूँकि जीवन प्रत्येक व्यक्ति का स्वत्व है अतः जीवन ज्ञान प्रमाणित होना सहज है। 

मनुष्य का संपूर्ण लक्ष्य व्यवहार में सामाजिक, व्यवसाय में स्वावलंबी, व्यवस्था का प्रमाण (स्वयं में व्यवस्था) और समग्र व्यवस्था में भागीदारी होना है। इसका स्त्रोत जीवन और जीवन गत अक्षय बल, अक्षय शक्ति रूपी महिमा ही है। इस प्रकार जीवन की आंशिक महिमा, व्यवहार में सामाजिकता को, व्यवसाय में स्वावलम्बन को बनाए रखना, व्यवस्था में विश्वास और उसकी निरंतरता को, प्रमाणित करना और बनाए रखने योग्य परम्परा को स्थापित करना है।

जीवन विद्या का आधार अस्तित्व है। उसका प्रमाण प्रत्येक मनुष्य है।प्रत्येक मनुष्य में शरीर की विविधता देखने को मिलती है। शरीर रचना के मूल तत्व प्राण कोषा है और वह मूलतः समान है। जबकि प्रत्येक जीवन में अक्षय बल, अक्षय शक्तियों की समानता है और जीवन जागृति क्रम में उसके प्रकाशन, संप्रेषण एवं अभिव्यक्ति में विविधता है। जीवन जागृति की स्थिति में सार्वभौम है होना पाया जाता है। जिससे अर्ध जागृत, जागृत और पूर्ण जागृत भेदों में वर्गीकृत है। 

मानव परंपरा में प्रमाणों को प्रमाणित करने का क्रम या आवश्यकता पहले से ही है। एवं अभी भी है तथा निरंतर रहेगी। इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि मानव में, से, के लिए प्रामाणिकता परम महत्वपूर्ण है। 

जीवन विद्या के प्रकाश में यह भी सूत्र मानव परंपरा को करत लगत है कि पूर्णता के अनंतर पूर्णता की निरन्तरता होती है। अस्तित्व परम-पूर्ण है और अस्तित्व में प्रत्येक एक, पूर्णता का अंकुर सम्पन्न है।

जीवन गठन पूर्ण पद में व उसकी निरन्तरता में प्रकाशित है ही जागृति क्रम क्रियापूर्णता, आचरण पूर्णता व उसकी निरन्तरता का होना, जागृति सहज अभिव्यक्ति है। इसीलिए जीवन क्रिया पूर्णता और आचरण पूर्णता के निरन्तरता की पूर्णता के अनंतर उसकी निरन्तरता क्रम में ही देखने को मिलता है। 

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