4. जीवन विद्या (क्र. ४)
बुद्धि ज्ञान की, वृत्ति तर्क की, मन आशा की एवं आत्मा अनुभव की क्षमता को प्रकट करती है। अनुभव ही पूर्ण विश्राम है।
मनुष्य का आहार विहार एवं व्यवहार उसके संग्रह, द्वेष, अविद्या, अभिमान और भय से मुक्त होने पर विश्राम है। इसका उत्तरदायी व्यक्ति है। परधन, परनारी, पर-पुरुष एवं परपीड़ा से मुक्त तथा स्वधन, स्वनारी, स्व-पुरुष और दया से युक्त व्यवहार ही स्वस्थ सामाजिक व्यवहार है। जिसका उत्तरदायित्व समाज और व्यवस्था पर है।
विश्राम हेतु ही पदार्थावस्था अस्तित्व के लिए, प्राणावस्था अस्तित्व सहित पुष्टि एवं कुलीनता के लिए, जीवावस्था अस्तित्व पुष्टि एवं कुलीनता सहित जीवन और भोग के लिए तथा ज्ञानावस्था अस्तित्व पुष्टि कुलीनता एवं जीवन भोग सहित अध्ययन, सामाजिकता, व्यवसाय, उपभोग एवं वितरण व्यवस्थापूर्वक सुख के लिए संघर्ष एवं प्रयासरत है।
प्रत्येक मनुष्य विश्राम की आकांक्षा से ही ह्रास या विकास की ओर गतित है।
विकास भेद से अवस्था, अवस्था भेद से आशा और आकांक्षा, आशा और आकांक्षा भेद से मूल प्रवृत्ति व निवृत्ति, मूल प्रवृत्ति व निवृत्ति भेद से आसक्ति व अनासक्ति, आसक्ति व अनासक्ति भेद से विवशता व विवेक, विवशता व विवेक भेद से संवेग और निष्ठा, संवेग और निष्ठा भेद से व्यवहार व आचरण, व्यवहार और आचरण भेद से फल व प्रतिक्रिया, फल व प्रतिक्रिया भेद से समस्या और समाधान, समस्या व समाधान भेद से श्रम व विश्राम, श्रम व विश्राम भेद से ह्रास व विकास है।
स्थूल, सूक्ष्म और कारण भेद से जानकारी है। शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गंधेन्द्रियों द्वारा प्राप्त जानकारी स्थूल है। मन, वृत्ति, चित्त एवं बुद्धि द्वारा जानकारी सूक्ष्म है। आत्मा का अस्तित्व बोध होना कारण जानकारी तथा व्यापकता में अनुभूत होना ही महाकारण जानकारी अथवा परम ज्ञान है।
समस्त अभिव्यक्ति क्रिया के रूप में है। रूप और शब्द के रूप में क्रियायेँ हैं। ये सभी क्रियायें मानव के लिए क्रांति, प्रतिक्रांति संवेग एवं प्रयोग के लिए सहायक सिद्ध हुई हैं।
दूसरे का प्रभाव आवश्यकता एवं अवस्था पर निर्भर करता है। विकास के क्रम में ही सम्पूर्ण इकाईयों की अवस्थाएँ हैं। संगठन-विघटन भेद से रूप, रूप-भेद से अवस्था, अवस्था भेद से विकास, विकास भेद से माध्यम, माध्यम भेद से क्षमता, क्षमता भेद से प्रतिष्ठा, प्रतिष्ठा भेद से प्रवृत्ति, प्रवृत्ति भेद से क्रिया, क्रिया भेद से प्रगति, प्रगति भेद से परिणाम व परिमार्जन, परिणाम व परिमार्जन भेद से योग-वियोग तथा योग-वियोग भेद से संघटन एवं विघटन है।
अमानवीयता की सीमा में विश्राम नहीं है। मानवीयता की सीमा में ही विश्राम है। निर्भ्रमता ही निर्भयता, निर्भयता ही विश्राम तथा विश्राम ही निर्भ्रमता है।