अस्तित्व में दृष्टा पद प्रतिष्ठा, जीवन में समाहित है अथवा दृष्टा पद प्रतिष्ठा का सम्पूर्ण कारक तत्व जीवन में ही समाहित है। 

जीवन और अस्तित्व का दृष्टा अस्तित्व सहित जीवन ही है। इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि अस्तित्व में विकास की यात्रा, दृष्टा पद प्रतिष्ठा तक है। इसी के साथ यह भी स्पष्ट होना सहज है कि जीवन विद्या के मूल स्वरूप में जीवन-जागृति ही प्रधान अर्थ है।  

जीवन विद्या और वस्तु विद्या का अविभाज्य अध्ययन (आत्मा,अनुभव की साक्षी में स्मरण पूर्वक किया गया संपूर्ण किया कलाप) की अनिवार्यता इस प्रकार से समीचीन हुई कि अस्तित्व में जड़ प्रकृति और चैतन्य प्रकृति का सहअस्तित्व सहज है। इसके मूल में अस्तित्व स्वयं सत्ता में संपृक्त प्रकृत्ति ही संपूर्ण भाव और सहअस्तित्व होना है। इससे यह पता लगता है कि अस्तित्व स्वयं सहअस्तित्व महिमा संपन्न है। सहअस्तित्व की महिमा से मुक्त होने अथवा दूर होने का दिशा काल देश नहीं है। इसलिए सहअस्तित्व का प्रभाव, अथवा प्रभाव क्षेत्र सतत अस्तित्व में होना पाया जाता है। इसलिए अस्तित्व मूलक सहअस्तित्व सहज प्रणाली मनुष्य के अध्ययन के लिए वस्तु होना शाश्वत सत्य है। इस प्रकार सहअस्तित्व का वैभव स्वयं स्पष्ट होता है। इसी क्रम में जड़ प्रकृत्ति और चैतन्य प्रकृत्ति का अस्तित्व होना भी सहज है। प्रत्येक मनुष्य में जड़ प्रकृति, प्राण कोशिकाओं से रचित शरीर के रूप में दृष्टव्य है। चैतन्य प्रकृति- आशा विचार इच्छा संकल्प अनुभव रूपी अक्षय शक्ति और मन, वृत्ति, चित्त, बुद्धि, आत्मा रूपी अक्षय बल के संयुक्त रूप में अध्ययनगम्य है। यह दोनों सत्ता में अर्थात् अरूपात्मक स्थिति पूर्ण वैभव में संयुक्त रहना देखने को मिलता है देखने का तात्पर्य समझने से है। इस यथार्थ - स्थिति से यह स्पष्ट होता है कि जड़ चैतन्य प्रकृत्ति का सहअस्तित्व स्वयं किसी प्रयोजन के अर्थ में है, उस प्रयोजन को समझना ही अध्ययन का अर्थ है। अर्थात् जीवन दृष्टा पद में होने का अर्थ है। जीवन जागृति दृष्टा पद का द्योतक है। 

अस्तित्व में, अस्तित्व का दृष्टा जीवन ही होना प्रमाणित होता है। मूलतः शरीर का भी दृष्टा जीवन ही है। शरीर की जीवंतता प्रदान करने वाला भी जीवन है। जीवन विहीन शरीर का अथवा शरीर से कोई व्यावहारिक अर्थ सिद्ध नहीं हो पाती। यही सहअस्तित्व की महिमा और कार्य प्रमाणित होता है। दूसरी महिमा - जीवन अपने आशा, विचार, इच्छा, संकल्प और अनुभूति के आधार पर सभी कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेंद्रियों को संचालित करता है अथवा जीवन से संचालित होता है, तीसरा - शरीर के द्वारा जीवन अपने आचरणों को व्यक्त करता है। ऐसा आचरण ही व्यवस्था, व्यवहार, व्यवसाय और अध्ययन के रूप में और कायिक, वाचिक, मानसिक, कृतकारित, अनुमोदित क्रिया कलापों के रूप में देखने को मिलता है, और प्रमाणित होता है। इसकी सहज समीचीनता को प्रत्येक व्यक्ति में कहे गए चारों आचरण के प्रति आशयों का होना सर्वेक्षण पूर्वक प्रमाणित होता है। इस प्रकार अस्तित्व में अध्ययन करने की वस्तु, अस्तित्व, सहअस्तित्व, विकास, जीवन, जीवन जागृति, रासायनिक-भौतिक रचना और विरचनाएं हैं। इससे अधिक अस्तित्व में अध्ययन के लिए वस्तु नही है, इससे कम में अध्ययन पूरा होता नहीं है। 

अस्तित्व और जीवन जागृति, व्यवस्था के अर्थ में समीकृत होता है। अर्थात् व्यवहारान्वयन क्रियान्वयन बोधगम्य, आचरणगम्य होता है। व्यवस्था स्वयं वर्तमान में विश्वास, वर्तमान में विकास और वर्तमान में स्वभाव गति, यह दृष्टा

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