पद प्रतिष्ठा में होने वाली प्रमाण और प्रामाणिकता है। प्रकारांतर में इस सहज आशय से प्रत्येक मनुष्य में आशा, आकांक्षा, अभीप्सा के रूप में होना पाया जाता है या कल्पना के रूप में भी पाया जाता है। इन तथ्यों को अवलोकन करने पर यह पता लगता है कि प्रत्येक मनुष्य में कर्म स्वतंत्रता और कल्पनाशीलता सहज रूप में व्यक्त होते रहता है। ऐसे दोनों वैभव के तृप्ति बिंदु को पहचानना एक आवश्यकता है अथवा अनिवार्यता है इस आधार पर हम इस बात को अर्थात् मनुष्य इस बात को प्रमाणित करने के लिए योग्य है कि कल्पनाशीलता का तृप्ति बिंदु स्वराज्य के रूप में, और कर्म स्वतंत्रता का तृप्ति बिंदु स्वानुशासन के रूप में प्रमाणित होता है तथा अध्ययनगम्य और बोधगम्य भी है।

आचरण व्यवहारगम्य होता है। यह ही जीवन विद्या की रोशनी में दिखने वाले और समझ में आने वाले तथ्य हैं। इसी के साथ और भी एक यथार्थ समझ में आता है कि मनुष्य के शरीर में कोई ऐसा अवयव नहीं है जो, न्याय की अपेक्षा करता हो, प्रयत्न करता हो। इस बात को समझने के उपरांत यह भी समझ में आता है कि नियम, न्याय, समाधान, सत्य का दृष्टा शरीर नहीं हो पाता, जीवन ही होता है। इन तथ्यों के आधार पर शरीर और जीवन के सहअस्तित्व में शरीर की उपयोगिता, जीवन की प्रयोजनीयता दोनों साक्षित हो पाते हैं। इसे केवल जीवन विद्या के नजरिया से ही देखा जाता है और समझा जाता है। इस प्रकार मानव परम्परा का वैभव और उसका स्त्रोत समझ में आता है। जीवन अपनी जागृति स्वानुशासन के रूप में सर्वसुलभ प्रमाणित करती है। साथ ही शरीर का उपयोग मानव परम्परा में समाज गति के अर्थ में प्रमाणित हो पाती है। यद्यपि इसमें जीवन जागृति ही प्रधान वस्तु है। इस प्रकार जीवन के अभिव्यक्त होने का माध्यम शरीर है और शरीर का उपयोग मानव परंपरा के अर्थ में है न कि व्यक्ति के अर्थ में। 

जीवन जागृति का सत्यापन व्यवहार में सामाजिक, व्यवसाय में स्वावलंबी और प्रत्येक मनुष्य स्वयं में एक व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदारी के रूप में है। यही मानव परंपरा का वैभव है। मानव अपने में उक्त वैभव के आधार पर अखंड समाज और सार्वभौम व्यवस्था है। जो सदा सदा के लिए प्रत्येक मनुष्य से सम्पूर्ण मनुष्य तक समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व को निरंतर उदयशील बनाए रखने के लिए सम्पूर्ण सामर्थ्य संपन्न है। यही धरती को स्वस्थ, सुंदर समाधानपूर्ण पद्धति-प्रणाली और नीतियों का कला वैभव है, जिसको प्रमाणित करने की अर्हता को प्रदान करना ही शिक्षा संस्कार की सार्थकता है। उसे मूल्यांकन करने की विधि ही स्वयं व्यवस्था है और शरीर पोषण, संरक्षण समाज गति के लिए अर्पित होना सम्पूर्ण उत्पादन का उयोग, सदुपयोग और प्रयोजन है। इस विधि से मानव व्यवस्था, अखण्ड समाज, सामाजिकता और समृद्धि की अविभाज्य अभिव्यक्ति है। यही वस्तु विद्या और जीवन विद्या की संयुक्त शिक्षा का प्रयोजन है तथा यही उच्च शिक्षा का अभीष्ट। 

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