6. जीवन विद्या (क्र. ६)

दिव्यपथ संस्थान,अमरकंटक,

29.8.91

जीवन विद्या - जीवन को निरीक्षण, परीक्षण, सर्वेक्षण पूर्वक जानने मानने का क्रियाकलाप है। 

  • निरीक्षण :- स्वयं को और दूसरे को रूप, गुण, स्वभाव धर्म को संबंधी धर्म और उसके संबंध में है। 
  • परीक्षण :- जो रूप, गुण, स्वभाव धर्म को देखा गया वह उसी प्रकार स्वयं में और दूसरे मनुष्य में कार्य कर रहा है या नहीं, इसका निष्कर्ष निकालना ही परीक्षण कार्य है। 
  • सर्वेक्षण :- जीवन का स्वरूप, कार्य, प्रभाव, परिणाम स्वयं में और दूसरे में समान है कि नहीं इस बात को जानने, मानने, पहचानने, निर्वाह करने के रूप में प्रमाणित करता है। 

अध्याय -1

मनुष्य मनुष्य के साथ पहचानना और निर्वाह करना जानना मानना ही शाश्वत कसौटी है। 

जीवन का अर्थ :- कार्य रूप में जानना, मानना, पहचानना निर्वाह करना है। जीवन अपने में आशा, विचार, इच्छा, संकल्प जैसी अक्षय शक्तियां एवं मन, वृत्ति, चित्त, बुद्धि और आत्मा जैसी अक्षय बल का अविभाज्य वर्तमान है। 

मन - आशा पूर्वक चयन और आस्वादन करने की क्रिया है। 

  • वृत्ति - विचार पूर्वक विश्लेषण करने की क्रिया है।
  • चित्त - इच्छा पूर्वक चित्रण और चिंतन करने की क्रिया। 
  • बुद्धि - अपने संकल्प सहित बोध और अवधारणात्मक क्रिया। 
  • आत्मा - प्रामाणिकता सहित जानने मानने की क्रिया। 
  • मनुष्य ही स्वयं जीवन का अध्ययन करेगा और अध्ययन का वस्तु भी है। 

मुख्य रूप से जीवन का अध्ययन अपने प्रयोजन के रूप में स्वयं के प्रति विश्वास, श्रेष्ठता के प्रति सम्मान है। 

अध्याय -2

मनुष्य के जीवन शक्तियां और बल का जागृति पूर्वक व्यक्त होना। 

अर्ध जागृति पूर्वक व्यक्त होना। 

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