10. जीवन विद्या (क्र. १०)
योजना का तात्पर्य नियमपूर्ण कार्य (उत्पादन, विनिमय व सेवा) तथा न्यायपूर्ण व्यवहार (सम्बंधों की पहचान व उनमें निहित मूल्यों के निर्वाह) से है। जीवन विद्या योजना का अध्यवसायी स्वरूप अस्तित्व में अनुभवमूलक व्याख्या है तथा कार्यरूप अस्तित्व में अनुभव पर्यंत अध्ययन, अभ्यास, व चिंतन का निर्देशन है।जीवन क्षमता प्रत्येक व्यक्ति में समान रूप से वर्तमान है। यह क्षमता आशा, विचार, इच्छा, संकल्प व अनुभूति जैसी अक्षय शक्तियों तथा मन, वृत्ति, चित्त, बुद्धि तथा आत्मा जैसे अक्षय बलों का अविभाज्य स्वरूप है। मनुष्य की जीवंतता इन्हीं बलों की स्थिति और शक्तियों की क्रियाशीलता से स्पष्ट होती है। मनुष्य जड़ और चैतन्य प्रकृति का संयुक्त स्वरूप है। प्रकृति चैतन्य पद में जीवन कहलाती है तथा शरीर रूप में जड़। चैतन्य का तात्पर्य संचेतना से, संचेतना का तात्पर्य संज्ञानीयता व संवेदनशीलता से, संज्ञानीयता व संवेदना का तात्पर्य जानने व मानने से तथा जानने व मानने का तात्पर्य पहचानने व निर्वाह करने योग्य क्षमता, पात्रता व योग्यता से है। जड़ का तात्पर्य भौतिक व रासायनिक रचनाएँ व विरचना समुच्चय से है। इस तरह अस्तित्व में जीवन दृष्टा ही पद में होना पाया जाता है।जानने एवं मानने की सम्पूर्ण वस्तु अस्तित्व, अस्तित्व में परमाणु और परमाणु का विकासक्रम, विकासक्रम में जीवन अथवा चैतन्य पद और जड़ अर्थात् भौतिक वर रासायनिक रचनाएँ एवं विरचनाएँ एवं जीने के क्रम में जीवन जागृति है। इन सबका दृष्टा जीवन ही है। जीवन ही जागृति पूर्वक प्रामाणिकता की अभिव्यक्ति व सम्प्रेषणा तथा न्यायपूर्ण व्यवहार व नियमपूर्ण व्यवसाय व्यवस्था के प्रकाशन रूप में कर्ता पद में है। इस प्रकार जीवन ही दृष्टा व कर्ता स्वयं व्यवस्था है और अस्तित्व सम्पूर्ण के साथ भागीदारी है को स्पष्ट करना जीवन विद्या का प्रयोजन है।
जीवन विद्या में पारंगत मनुष्य ही मानवीयतापूर्ण मनुष्य है। ऐसे मनुष्य ही राष्ट्रीय चरित्र के सूत्र, लोकतंत्र के बल तथा मानवीय शिक्षा संस्कार व व्यवस्था के आधार हैं। जीवन विद्या की गति मानवीय संस्कृति, सभ्यता व नीति है। मानवीयतापूर्ण समाज का वैभव प्रत्येक मनुष्य का प्रमाणित, समाधानित, समृद्ध, अभय व सहअस्तित्वपूर्ण होना ही है। इसीलिये प्रत्येक मनुष्य का जीवन विद्या मे पारंगत होना एक अनिवार्यता है।