- समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व के रूप में स्वराज्य, स्वतंत्रता अथवा सार्वभौम व्यवस्था/अखण्ड समाज में भागीदारी के क्रम में प्रमाणित होती हैं।
जीवन विद्या मनुष्य को, जीवन क्रियाकलाओं को बोधगम्य कराती है जैसे कल्पनाशीलता, कर्मस्वतंत्रता जीवन का मौलिक गुण है इसके आधार पर व्यवस्था, अव्यवस्था, न्यायान्याय, समाधान, सभ्यता, समृद्धि-असमृद्धि, अभय-भय, देश काल दिशा गति और स्थिति आदि पक्षों की गणना की जाती है यह प्रक्रिया प्रत्येक मनुष्य में प्रकारान्तर से प्रमाणित है।
जीवन विद्या, जीवन क्रिया को क्रम से जानने मानने, पहचानने और निर्वाह करने के प्रमाणों को प्रमाणित करती है जैसे सत्ता में सम्पृक्त प्रकृति के रूप में अस्तित्व का नित्य वर्तमान होने का अध्ययन मानव को अस्तित्व में अविभाज्य रूप में होने के प्रमाण को अध्ययन सुलभ करता है अस्तित्व स्वयं में सहअस्तित्व के रूप में बोध गम्य है, प्रत्येक इकाई के सभी ओर से सीमित रहने के आधार पर सत्ता में घिरे रहना प्रमाणित होता है।
जीवन विद्या (ज्ञान) अस्तित्व दर्शन को प्रमाणित करता है। सत्ता व्यापक प्रकृति अनन्त होने के कारण सत्ता में प्रकृति का वर्तमान और सम्पृक्त होना प्रमाणित है, प्रकृति ही अस्तित्व में विकासपूर्वक विभिन्न अवस्थाओं सहित जड़-चैतन्य प्रकृति के संयुक्त रूप में प्रमाणित होता है। सत्ता ही ईश्वर, परमात्मा, ज्ञान, निरपेक्ष शक्ति के नाम से इंगित है।
जीवन विद्या अस्तित्व में परमाणु में ही विकास होना प्रमाणित करती है, प्रत्येक अणु के मूल में अनेक परमाणुओं को पाया जाता है ऐसे परमाणु अनेक प्रजातियों के रूप में, अंशों के संख्या-भेद से पहचाने जाते हैं। ऐसे सभी प्रजातियों के परमाणुओं को एक कतार में देखने से स्पष्ट होता है कि कुछ अंशों की सीमा तक गठित परमाणुओं में और अंशों के समाने की संभावना शेष रहती है उसके बाद और जितने प्रकार के परमाणु होते हैं उनको देखने पर पता चलता है कि उन्हें अजीर्ण हो गया है क्योंकि उनमें से कुछ टूट कर अलग होना चाह रहे हैं; इस प्रकार अजीर्ण और भूखे परमाणुओं के बीच एक ऐसे तृप्त परमाणु की कल्पना होती है।
वर्णित सभी प्रकार के परमाणु अपनी अतृप्ति को अणु और अणु रचित रचना-विरचना सहित भौतिक रासायनिक वैभव प्रकाशित करते हैं। यही जड़ प्रकृति है जबकि अस्तित्व में जड़ और चैतन्य प्रकृति देखने में आती ही है। जड़ प्रकृति वह है जिसका समस्त क्रियाकलाप उसकी लम्बाई चौड़ाई ऊंचाई तक ही सीमित होता है। जबकि चैतन्य प्रकृति अपनी लम्बाई चौड़ाई ऊंचाई से अधिक स्थान तक क्रियाशील होती है उसमें आशा, विचार, इच्छा संकल्प और अनुभव जैसी अक्षय शक्तियों का प्रकाशन होता है - इसका साक्षी स्वयं मनुष्य ही है। इस प्रकार मनुष्य ही जड़-चैतन्य प्रकृति का अध्ययन करता है तथा अवधारणाओं सहित अनुभव करता है। इसी तथ्यवश मनुष्य ही अस्तित्व में दृष्टा पद में होना प्रमाणित होता है।
मनुष्य शरीर रासायनिक-भौतिक रचना के रूप में स्पष्ट हो चुका है। मनुष्य ही आशा, विचार, इच्छा, संकल्प और अनुभव को प्रकाशित सम्प्रेषित और अभिव्यक्त करता है यही प्रमाण जीवन में अक्षय शक्तियों को स्पष्ट करता है और बल और शक्ति का अविभाज्य वर्तमान होने के सिद्धान्त के अनुसार अक्षय शक्तियां गति में होने के मूल में अक्षय बलों का परीक्षण करने पर पता चलता है कि वे मन, वृत्ति, चित्त, बुद्धि और आत्मा के रूप में नित्य वर्तमान हैं। यही