अस्तित्व ही सम्पूर्ण भाव स्थिति व गति होने के कारण मानव का अस्तित्व में अविभाज्य होना स्पष्ट है। साथ ही मानव सर्वाधिक विकसित प्रकृति है, इसकी मौलिकता, कर्म स्वतन्त्रता और कल्पनाशीलता के रूप में प्रत्येक मनुष्य में वर्तमान होना स्पष्ट है। ऐसी मौलिक स्थिति व गति सहज रूप में अप्राप्ति की प्राप्ति, अज्ञात का ज्ञात सम्पन्न होने के क्रम में अभिहित है। फलतः :-

  • कौन अज्ञात का ज्ञाता और अज्ञान को प्राप्त करता है?
  • मैं कौन हूँ? क्या हूँ? कैसा हूँ? में क्या उद्गार बिन्दु कहाँ है। 
  • जीव और जगत का प्रयोजन क्या है? यह विकास हो तब इसका मूल रूप क्या है? जीव और जगत किसी की इच्छा, संकल्प, प्रभाव, अनुग्रह प्रसाद हो तब वह क्या है ?

इस प्रकार अनेकानेक प्रश्न का मनः पटल पर उभरना मनुष्य की मौलिकता ही है। उक्त सभी प्रकार के और जितने भी प्रश्न उभर सकते हैं, उन सबका निराकरण और समाधान स्रोत की नित्य संभावना है। अस्तित्व में मानव और जीवन जागृति है। 

अस्तु जीवन जागृति क्रम में ही प्रामाणिकता व समाधान वर्तमान होने के कारण अस्तित्व में जीवन विद्यामूलक और जीवन जागृति लक्षित अभ्यास का जीवन लक्षित गति सहज होना ही सम्पूर्ण आयाम, कोण, परिप्रेक्ष्य और दिशा में समाधान व उसकी निरंतरता है। 

अस्तित्व में जीवन विद्या का स्रोत :-

अस्तित्व ही सम्पूर्ण भाव स्थिति व गति होने के कारण जीवन जागृति नित्य विद्यमान है। अस्तित्व ही जीवन जागृति में, से, के लिये सम्पूर्ण वस्तु है।

  • अस्तित्व ही सहअस्तित्व और सम्पूर्ण विकास है।
  • अस्तित्व ही विकास क्रम में जीवन है।
  • अस्तित्व ही दृश्य, दृष्टा व दर्शन है।
  • अस्तित्व ही ध्याता, ध्यान और ध्येय है। 
  • इस प्रकार यह लक्ष्य सार्वभौम होने के कारण एवं जीवन जागृति सबका इष्ट होने के कारण यह नित्य स्रोत के रूप में विद्यमान है। क्योंकि :- “जो था नहीं वह होता नहीं” 

अस्तित्व में जीवन विद्या की सहज साधना प्रक्रिया :-

मन में होने वाले आस्वादन को तुलन प्रतिष्ठा में, 

व्रति में होने वाले तुलन को चित्रण प्रतिष्ठा में, 

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