9. जीवन विद्या (क्र. ९)

3.3.93

सुख की चाह मानव में समान रूप से विद्यमान है। सभी अपने-अपने ढंग से इसके लिए सतत् प्रयत्नशील रहते हैं। किन्तु प्रायः दुःख से छुटकारा मिलता नहीं है।

  • दुःख का मूल कारण भ्रम ही है। अत: निर्भ्रम होना ही मानव जीवन का परम लक्ष्य है। स्वयं के प्रति निर्भ्रम होना, अस्तित्व के स्वरूप के प्रति निर्भ्रम होना, परस्पर संबंधों व मूल्यों के प्रति निर्भ्रम होना व तदनुरूप आचरण में प्रमाणित होना ही हमारा लक्ष्य है। सतत् जागृति ही इसका उपाय है। इससे मानव परंपरा में समाधान, समृद्धि, संतोष व आनंद की उपलब्धि संभव है। 
  • अस्तित्व में चेतना एवं पदार्थ अविभाज्य रूप से विद्यमान हैं। अरूपात्मक, व्यापक सत्ता में संपृक्त रूपात्मक प्रकृति ही अस्तित्व सर्वस्व है। सत्ता स्थितिपूर्ण है तथा प्रकृति की अनन्त इकाइयाँ परस्पर स्थितिशील हैं। इनमें सहअस्तित्व अर्थात् परस्परता में पूरकता है।
  • प्रकृति में पदार्थावस्था, प्राणावस्था, जीवावस्था, एवं ज्ञानावस्था के क्रम में विकासक्रम दृष्टिगोचर होता है। प्रकृति की मूल इकाई को परमाणु कहा जाता है। विकास का परम लक्ष्य जागृति ही है। 
  • मनुष्य शरीर एवं जीवन का संयुक्त रूप है। शरीर नश्वर है जबकि जीवन अक्षय शक्ति, अक्षय बल सम्पन्न गठनपूर्ण परमाणु शाश्वत है। 
  • जीवन के अक्षय शक्ति अक्षय बल को प्रत्येक मनुष्य स्वयं में चयन-आस्वादन, विश्लेषण-तुलन, चित्रण-चिंतन, संकल्प-बोध, प्रामाणिकता एवं अनुभव रूप में पहचान सकता है। ये सब अविभाज्य जीवन क्रियायें हैं। 
  • मनुष्य में जीवन का फल अर्थात् व्यवहार जानने, मानने, पहचानने व निर्वाह करने के रूप में सदा कार्यरत है। जानने, मानने, पहचानने व निर्वाह करने के क्रम में तृप्त होने के अभ्यास से जीवन जागृति संपन्न होती है। 
  • पूर्ण विकसित इकाई में आत्मानुवर्ती बुद्धि, चित्त, वृत्ति एवं मन की क्रियायें मध्यस्थीकरण प्रणाली से नियन्त्रित होती हैं जिसके फलस्वरूप ही सुख, शान्ति, संतोष एवं आनंद की प्रतिष्ठा होती है।
  • मनुष्य में व्यावहारिक मध्यस्थता न्याय से, वैचारिक मध्यस्थता धर्म से, अनुभव की मध्यस्थता ज्ञान से है। इसी से द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद के बजाय समाधानात्मक भौतिकवाद, संघर्षात्मक जनवाद के बजाय व्यवहारात्मक जनवाद तथा रहस्यात्मक अध्यात्मवाद के बजाय अनुभवात्मक अध्यात्मवाद। 
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