जीवन की अपने प्रकाश में स्वयं को पहचानने की विधि, प्रक्रिया सहज भाव में स्पष्ट हो जाती है जैसा मन का चयन और आस्वादन कार्य, वृत्ति का विश्लेषण और तुलन, चित्त का चित्रण और चिंतन, बुद्धि का बोध और संकल्प तथा आत्मा का अनुभव और प्रामाणिकता में आने की विधि परीक्षण पूर्वक स्पष्ट होती है।
यही क्रम से एक दूसरे की परीक्षण और अनुभव विधि अथवा अविभूत होने की विधि से मनुष्य में स्वनिरीक्षण-परीक्षण प्रक्रिया के आधार पर प्रत्येक मनुष्य में प्रमाणित होती है। जैसा चयन और आस्वादन क्रियाकलापों को विश्लेषण और तुलन के प्रकाश में निरीक्षण-परीक्षण करने पर मन वृत्ति में अविभूत होता हुआ समझ में आता है। विश्लेषण और तुलन क्रियाकलापों को चित्रण और चिंतन के प्रकाश में निरीक्षण-परीक्षण करने पर वृत्ति चित्त में अविभूत होती है। संकल्प प्रकाश में परीक्षण-निरीक्षण करने पर चित्त बुद्धि में अनुभूत होता हुआ दिखाई देता है। दिखाई देने का तात्पर्य समझने से और समझने का तात्पर्य जानने, मानने से है। बोध और संकल्प क्रियाकलापों को प्रामाणिकता और अनुभव के प्रकाश में बुद्धि आत्मा में अनुभूत हुई समझ में आती है। यही जीवन जागृतिपूर्वक दृष्टा होने का प्रमाण है। यही अक्षय शक्ति, अक्षय बल की प्रामाणिकता है।
जीवन विद्या, स्वयं का स्वयं में, स्वयं से स्वयं के लिये अध्ययन (अवधारणा) और अनुभव के साथ साथ प्रत्येक मनुष्य जीवन और शरीर का संयुक्त रूप में प्रकाशित होने के सूत्र को सहअस्तित्व के रूप में उद्घाटित करता है। फलस्वरूप संबंधों की पहचान सहज रूप में समझ में आती है और पहचान और निर्वाह करने की उपयोगिता, सदुपयोगिता, और प्रयोजनीयता को क्रम से अखण्ड समाज में भागीदारी, सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी, स्वानुशासन के रूप में प्रमाणित होती पाई जाती है। मानव परम्परा में इन्हीं उपलब्धियों के साथ स्वस्थ परम्परा के रूप में वैभवित होना सहज, वांछित और आवश्यक है । मानवत्व मानव का स्वत्व होने के कारण स्वतंत्रता और अधिकार अविभाज्य रहता है। यद्यपि अस्तित्व में प्रत्येक एक अपने "त्व" सहित व्यवस्था के रूप में है जैसा लोहा, लोहत्व के साथ, आम आमत्व के साथ, नीम नीमत्व के साथ, गाय गायत्व के साथ एवं मानव मानवत्व के साथ स्वयं व्यवस्था में और समग्र व्यवस्था में भागीदारी होना पाया जाता है।
जीवन विद्या के प्रकाश में मानवीयता, अतिमानवीयता और अमानवीयता स्पष्ट होती है, अस्तित्व में प्रत्येक एक में रूप, गुण, स्वभाव, और धर्म अविभाज्य रूप में वर्तमान होना पाया जाता है। मानव मानवत्व सहित ही व्यवस्था के रूप में प्रकाशित होता है। अमानवीयतापूर्वक वह अव्यवस्था की पीड़ा से पीड़ित पाया जाता है। अतिमानवीयतापूर्वक मानव परम्परा में, से, के लिये जागृतिपूर्ण जीवन तृप्ति को प्रमाणित करता हुआ स्पष्ट होता है। अतिमानवीयतापूर्वक मानव परम्परा में से, के, लिये जागृतिपूर्ण जीवन तृप्ति को प्रमाणित करता हुआ स्पष्ट होता है। अमानवीयता, मानवीयता, अति मानवीयता में स्वभाव प्रवर्तन और दृष्टियों की क्रियाशीलता के आधार पर व्याख्यायित होना ही प्रसिद्ध है। इसी क्रम में पाँच कोटि के मानव स्पष्ट हो जाते हैं जो पशु मानव, राक्षस मानव, मानव, देव मानव, और दिव्य मानव के रूप में अध्ययन गम्य है।
जीवन विद्या के प्रकाश में प्रत्येक मनुष्य मानवत्व सहित स्वयं व्यवस्था और सार्वभौम व्यवस्था में भागीदार होने का अध्ययन सुलभ होता है इसलिए प्रत्येक व्यक्ति स्वयं को पहचानने, श्रेष्ठता का मूल्यांकन करने, अखण्ड समाज और सार्वभौम व्यवस्था में भागीदार होना चाहता है इसलिये जीवन विद्या पारंगत होने के लिये आह्वाहन है।