ऐसी तृप्ति बिन्दु का स्वरूप, प्रामाणिकता व समाधान का होना पाया जाता है। ये स्वयं जीवन जागृति की अभिव्यक्तियाँ हैं। इसलिए जीवन जागृति, अभ्यास का सार्वभौम उद्देश्य है। 

“जीवन जागृति नियति क्रम व्यवस्था है” इसलिए उसकी पीड़ा निर्यात सहज है। यही नित्य संभावना है। 

समाधान में, से, के लिऐ सम्पूर्ण गति के लिए सेवा :-

मानवीय तथा नैसर्गिक सम्बन्धों को पहचानना और मूल्यों का निर्वाह करना। अस्तित्व में अभ्यास को साक्षित करने के लिये सार्वभौम विकल्पात्मक स्थिति व गति की आवश्यकता मानव में ,से, के लिए :-

  • समाधान, समृद्धि, अभय व सहअस्तित्व आवश्यकता है।
  • प्रामाणिकता व प्रमाण आवश्यकता है।
  • जीवन जागृति आवश्यकता है।
  • अनुभव बल, विचार शैली एवं जीने की कला में सामरस्यता आवश्यकता है।
  • ध्यान, ध्येय व ध्याता में सामरस्यात्मक स्थिति व गति आवश्यकता है।
  • दृष्टा, दृश्य व दर्शन में निर्भ्रमता आवश्यकता है।
  • अभ्यास, व्यवस्था व शिक्षा में सामरस्यता आवश्यकता है।
  • शिक्षा, व्यवस्था व आचरण में सामरस्यता आवश्यकता है।
  • अस्तित्व और अस्तित्व में जड़ चैतन्यात्मक प्रकृति का अंर्तसम्बन्धों के प्रति निर्भ्रम होना आवश्यकता है।

इस प्रकार साम्य रूप में अभ्यास की सार्वभौम आवश्यकताएँ स्पष्ट हैं। जिसके :- 

  • अभ्यास का स्रोत मनुष्य में,
  • अध्ययन का स्रोत मध्यस्थ दर्शन (सहअस्तित्ववाद) में,
  • प्रबंधन का स्रोत श्री भजनाश्रम एवं दिव्य पथ संस्थान अमरकंटक में सहज सुलभ है। 

विकल्प के रूप में जीवन विद्या एक संभावना 

प्रत्येक मनुष्य जीवन तृप्ति (प्रामाणिकता) व समाधान की संभावना के रूप में विद्यमान है।

  • प्रत्येक मनुष्य विश्राम की संभावना में विद्यमान है।
  • प्रत्येक व्यक्ति सार्वभौम व्यवस्था की संभावना में विद्यमान है।
  • प्रत्येक व्यक्ति जीवन जागृति की संभावना में विद्यमान है।
  • प्रत्येक व्यक्ति स्वतन्त्रता व स्वराज्य की संभावना में विद्यमान है।
  • विकल्पात्मक सम्पूर्ण संभावनाओं को आधार अस्तित्व एवं अस्तित्व में मानव ही है। 
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