11. जीवन विद्या (क्र. ११)

1 जनवरी 93

प्रत्येक मनुष्य जीवन और मनुष्य का नाम लेता है किन्तु जीवन और मनुष्य क्या है? नहीं जानता है। सर्वेक्षण से यही पता चलता है कि मनुष्य स्वयं के अस्तित्व को मानता तो है किन्तु अस्तित्व क्या है? यही नहीं जानता, उतना ही नहीं वरन् स्वयं के स्वरूप को, महिमा को, वर्चस्व को, प्रयोजन को जानना तो चाहता है किन्तु अब तक के प्राप्त धर्म, राज्य और शिक्षा-उपदेश, अभ्यास-पद्धति द्वारा न ही जान पाया है और न ही प्रमाणित हो पाया है। 

भौतिकवाद शरीर को ही मनुष्य का स्वरूप मानकर मनुष्य को अब तक विश्लेषित नहीं कर पाया है, कर पाया होता तो विश्लेषित मनुष्य सर्वमान्य हो जाता, प्रमाणित हो जाता। 

आदर्शवाद, आत्मा को सत्य, जीव जगत को मिथ्या बताते हुए मनुष्य को विश्लेषित करने से चूक गया। 

आशा के रूप में उपरोक्त दोनों विश्व दृष्टिकोणों ने मानव का शुभ चाहते हुए सत्य को उद्घाटित करने का दावा, संकल्प, इच्छा सहित अनेकानेक प्रयास किये जिसके फलन में वर्तमान स्पष्ट है। वर्तमान का फल-परिणाम ही मूल्यांकित होता है। वर्तमान में हम मानव भांति-भांति विधियों से समुदायों में बंटकर द्रोह-विद्रोह, शोषण, भय-प्रलोभन-आतंक, युद्ध और नाना वाद-विवादों के चंगुल में जकड़ कर रह गये हैं। इस जकड़न से हर मनुष्य मुक्त होना चाहता है। किन्तु दिशा विहीनता के कारण वह बारम्बार आवेश में आकर और घनी जकड़न में जकड़ जाता है। 

"अब दिशा मिल गई है” अस्तित्व मूलक मानव केंद्रित चिन्तन ज्ञान इसमें मनुष्य परिभाषित और व्याख्यायित है फलतः सर्वांगीण परम शुभ तक का मार्ग प्रशस्त है। इसे हृदयंगम करने व सार्थक होने के लिये "जीवन विद्या" उद्घाटित हो चुकी है, जिससे प्रत्येक मनुष्य स्वयं को जानने पहचानने निर्वहन करने एवं श्रेष्ठता के प्रति सम्मान करने की अर्हता से सम्पन्न होता है। 

  • जीवन विद्या स्वयं को समझने की क्रिया विधि है - मनुष्य, जीवन और शरीर का संयुक्त रूप में होना अध्ययनगम्य है। शरीर का अध्ययन भौतिक व रासायनिक पद्धति से सम्भव हो चुका है, जीवन प्रत्येक मनुष्य में जानने, मानने, पहचानने, निर्वाह करने के रूप में प्रमाणित होता है इसे बड़े, बूढ़े, बच्चे जवान सभी में समान रूप में देखने को मिलता है, साथ ही कर्मस्वतंत्रता, कल्पनाशीलता भी प्रत्येक मनुष्य में स्पष्ट है। अभिव्यक्ति के आधार पर परस्पर मनुष्य पहचानता है। 

मनुष्य की परिभाषा - मनाकार को साकार करने वाला एवं मनःस्वस्थता का आशावादी मानव है। मनाकार को साकार करने में खेती, किसानी, गोपालन, वृक्षारोपण, ग्रह निर्माण, प्रौद्योगिकीय उपक्रमों से सामान्य आकांक्षा अर्थात् आहार, आवास, अलंकार सम्बन्धी वस्तुओं और उपकरणों का उत्पादन है, महात्वाकांक्षी वस्तुओं यथा दूर-श्रवण, दूर-गमन, दूर-दर्शन सम्बन्धी वस्तुएं पहचानने में आ चुकी हैं जिनकी उपयोगिता, सदुपयोगिता, प्रयोजनीयताएं मनःस्वस्थता के संदर्भ में प्रमाणित हो जाती हैं। मन:स्वस्थताएं समाधान,

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