- चित्त में होने वाले चिंतन को बोध प्रतिष्ठा में,
- बुद्धि में होने वाले बोध को अनुभव प्रतिष्ठा में,
- आत्मा में होने वाले अनुभव को अस्तित्व प्रतिष्ठा में,
तद्रूपता पर्यंत किया जाने वाला प्रयास ही अथवा अभ्यास की ध्यान प्रक्रिया है, इस प्रक्रिया का अपने आप में सार्वभौम होना और प्रत्येक मनुष्य में, से, के लिये स्वत्व रूप का होना स्पष्ट है। इसलिए स्वानुशासन, स्वतन्त्रता एवं जीवन जागृति के रूप में प्रामाणिकता व समाधान सर्व सुलभ होता है।
“जिसे एक व्यक्ति समझ सकता है, कर सकता है, और पा सकता है। उसे प्रत्येक व्यक्ति समझ, कर, एवं पा सकता है।”
अस्तित्व में जीवन विद्या का प्रयोजन :-
- <a id="_Hlk218675666"></a>जीवन जागृति में आनंद (प्रामाणिकता) आत्मा में,
- जीवन जागृति में बोध (समाधान) बुद्धि में,
- जीवन जागृति में चिंतन (न्याय) चित्त में,
- जीवन जागृति में तुलन (नियम) वृत्ति में,
- जीवन जागृति में आस्वादन (मूल्य) मन में,
अभिव्यक्त संप्रेषित व प्रकाशित होता है। इस प्रकार अभ्यास का सम्पूर्ण प्रयोजन व्यवहार सुलभ हो जाना है।
अस्तु ध्यान प्रक्रिया प्रत्येक के लिये प्रबुद्धता व मेधाविता क्रम में कितना आवश्यक, अनिवार्य व अपरिहार्य है, यह स्पष्ट हो चुका है। ध्यान का ध्येय अस्तित्व में अनुभूति ही है। ध्याता स्वयं जीवन है, दृष्टि जीवन जागृति क्रम में अभिव्यक्त, संप्रेषित होने वाला न्याय, धर्म(समाधान), सत्य(प्रामाणिकता) है, इसलिए सार्वभौम है। अस्तित्व में अनुभूति ही जीवन जागृति एवं उसकी निरन्तरता है। जीवन जागृति ही सम्पूर्ण आयाम, कोण, दिशा, व परिप्रेक्ष्य में समाधान उसकी निरंतरता व परंपरा है। इसे प्रत्येक देश काल में मनुष्य वरता है। फलतः यह जीवन मूलक अभ्यास, सुखद, सुंदर एवं कल्याणमय होने की कामना से अर्पित है। अस्तित्व में अनुभवमूलक जीवन विद्या के प्रकाश में ही दृष्टा, दृश्य एवं दर्शन में सामरस्यता अनुभव बल, विचार शैली एवं जीने की कला में सामरस्यता व्यक्ति, परिवार, समाज (मानव इकाई) राष्ट्र और अंतर्राष्ट्र में सामरस्यता, व्यवसाय, व्यवहार, विचार व अनुभूति में सामरस्यता एवं सौन्दर्य बोध व व्यक्तित्व में सामरस्यता सहज सुलभ होगी।
नागराज शर्मा
प्रणेता- मध्यस्थ दर्शन (सह अस्तित्ववाद)
अमरकंटक