12. जीवन विद्या (क्र. १२)

Date – 13 June 2003, Friday  

*नागराज जी से सुनें हुए का श्रोता द्वारा प्रतिलेखन

 उद्देश्य - विद्या को भली प्रकार से समझना। 

1 - विद्या को समझने की आवश्यकता कैसे महसूस हुई: -

गोविन्दपुर में जो सीखा-समझा था वो अच्छा लगा और अब अपनी जिम्मेदारी व अपनी इच्छा से विद्या को समझना चाहती हूँ। इसी आधार पर अब अपना जीवन ढालना चाहती हूँ, जीना चाहती हूँ।

परिचय 

मैं अपने को होने के रूप में पहचानता हूँ। 

सभी मानव को होने के रूप में पहचानता हूँ। 

  • सभी जीव संसार, वनस्पति संसार, पदार्थ संसार सबको होने के अर्थ में पहचानता हूँ। 
  • मिट्टी-पत्थर से लेकर जीवों तक ये सब कैसे हैं, क्यों हैं, यह मुझे पूरा पता है। इसी के साथ मैं अपने को सोचता हूँ कि मैं क्यों हूँ? कैसा हूँ? हमारा क्या प्रयोजन है? 
  • इनको समझने के लिए यहाँ प्रस्तुत हूँ।  
  •  होने की स्वीकृति सबमें है। इसी प्रकार मुझ में भी है। होने के रूप में मेरी गतिविधियां खाने/कपड़े पहनने/किसी घर में निवास करने में/ इनमें मेरा होना पता लगता है। इसी के साथ मैं कैसी हूँ यह पता नहीं लगता है। 

हमारा सोच विचार शरीर से कहीं ज्यादा दिखता है। मनुष्य के साथ मेरा होना। किसी के साथ पहचान होना, किसी के साथ नहीं होना। पहचान होने के बाद भी कुछ के साथ निर्वाह होना व कुछ के साथ नहीं होना मैं महसूस करती हूँ। 

सबको पहचानने की विधि :-

होने के साथ सोच-विचार सबके साथ वर्तमान है। इसीलिए ये सोच विचार कहाँ से आता है (आंख नाक कान में तो नहीं होते, सिर पैर में भी नहीं होते हैं) इसको पूरा समझना हमारी एक आवश्यकता बनी। यही जीवन व जीवन महिमा को समझने की आवश्यकता बनी। 

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