2 - जीवन - विद्या
सभी मनुष्य अपने को जीवित रहना स्वीकारते हैं। जीवन व शरीर के संयुक्त रूप में सभी मानव जीवन्त बना रहता है।
जीवन अपने स्वरूप में जीने की आशा रखने वाला (हर व्यक्ति जीना चाहता है), सोच-विचारने वाला, अच्छा-बुरा मानता ही है। ये सब जीवन में होने वाली क्रियाएं हैं।
जीवन में अर्थात् मनुष्य में अच्छा-बुरा के लिए प्रिय हित लाभ के आधार पर स्वीकारना होता है।
प्रिय - संवेदनाओं के अनुकूल होने से अच्छा मानते हैं। इसके विपरीत होने से बुरा मानते हैं (या अप्रिय)
हित - शरीर स्वस्थता के लिए, जो अनुकूल है उसे हित मानते हैं। इसमें व्यतिरेक को अहित मानते हैं।
लाभ - मानव परंपरा में इसी को लाभ मानते हैं कि कम देकर ज्यादा मिलना।
इतनी विधाओं में हर मनुष्य जीता है। इस प्रकार किसी को ज्यादा मिल गया किसी को कम मिला ये कहाँ तक उचित है - नहीं है।
संवेदनाओं के अनुकूल होने मात्र से संबंधों का निर्वाह कैसे होगा?
ये परम्परा में बनी हुई है ये सही क्यों नहीं है –
मानव अपने स्वरूप को नहीं समझा। समझने पर क्या स्वरूप होता है -
मानव अपनी परिभाषा के रूप में मनाकार को साकार करने वाला व मन:स्वस्थता को प्रमाणित करने वाला है। इसमें से मनाकार को साकार करने की परम्परा स्पष्ट हो चुकी है। मनःस्वस्थता को प्रमाणित करने का पक्ष सफल नहीं हुआ। क्या परम्परा में कोई मनःस्वस्थता को प्रमाणित करने का प्रयत्न किया?– नहीं किया।
मनःस्वस्थता को प्रमाणित करने की आवश्यकता है या नहीं - है।
3 - मानव इस धरती पर जब से निवास कर रहा है।
अपनी परम्परा बना रहा है या इस धरती पर है। परम्परा में मन: स्वस्थता को प्रमाणित करने का क्या प्रयास किया?