अभी तक दो प्रकार की सोच विचार हमारे सम्मुख है– 1. ईश्वरवाद 2. भौतिकवाद

ईश्वरवाद:- ईश्वरवाद अपने में रहस्यमूलक व रहस्यगामी हो गया। जैसे कि ईश्वर है यह बताया गया लेकिन प्रमाणित होना नहीं बन पाया। ईश्वरवाद के अनुसार स्वान्तःसुख और मोक्ष के रूप में बताया गया। यही स्वान्त:सुख की गम्यस्थली रही। यह भी रहस्य हो गया और प्रमाणित नहीं हो पाया। मान्यताओं के आधार पर रुढ़ियां अभी भी बनी हुई हैं। इसमें ऐसे भी समझा जा सकता कि मनःस्वस्थता के लिए स्वान्तःसुख को मंजिल माना।  

भौतिकवाद: भौतिकवाद के अनुसार ज्ञानेन्द्रियों के लिए सुविधा ही सुख है, ऐसा मान लिया। जबकि ज्ञानेंद्रियों में अर्थात् शब्द, स्पर्श, रस, गंध में सुख भासता है, सुख होता नहीं है। इसीलिए पुनः विचार की आवश्यकता है। 

दूसरा ईश्वरवाद के अनुसार किताब प्रमाण बताया जाता है और भौतिकवाद में यंत्रों को प्रमाण मान लिया। इसीलिए मानव प्रमाण का आधार ही नहीं हुआ। 

प्रश्न: मानव जब प्रमाण नहीं है तो जिया क्या चीज? 

जीना ही स्वयं में प्रमाण है। जीने में ही मनःस्वस्थता का प्रमाण होता है। अभी तक हम मानव मनाकार को साकार करने में सफल हुए हैं। इसीलिए मन:स्वस्थता के लिए ज्ञान होना आवश्यक है। 

मनाकार को साकार करने तक मानव जीवन क्रियाओं में से साढ़े चार क्रियाओं को प्रयोग किया है और साढ़े पाँच क्रियायें प्रयोग में नहीं आया। ये क्रियायें प्रयोग में प्रमाणित होना ही जागृति का मतलब है अर्थात् मनःस्वस्थता प्रमाणित होने का रास्ता है मनःस्वस्थता को प्रमाणित करने के लिए और साढ़े पाँच क्रियाओं को प्रमाणित करना आवश्यक हो गया। 

जीवन में दस क्रियायें प्रमाणित होती हैं। इसे प्रमाणित करना ही जीवन जागृति है। 

जीवन में दस क्रियाओं का स्वरूप- 1-चयन, 2- आस्वादन, 3- विश्लेषण, 4- तुलन, 5- चित्रण, 6- चिंतन, 7- संकल्प, 8- बोध, 9- प्रमाण, 10- अनुभव 

ये दस क्रियायें प्रमाणित होना ही जागृति व मनःस्वस्थता होने का प्रमाण है। इसमें से साढ़े चार क्रियायें कैसे प्रमाणित हुआ लेकिन अन्य क्यों नहीं हुई? 

Page 92 of 106
88 89 90 91 92 93 94 95 96