धर्म का स्वरूप ऐसे प्रमाणित कर सकते हैं कि हर मानव, हर नर-नारी समाधान सम्पन्न होना चाहते हैं। ऐसा क्यों चाहते हैं इसे शोध किया गया। पता चला कि सुखी होने के लिए समाधान ही एक मात्र रास्ता है। मानव धर्म सुख है। समाधान का फलन सुख होना पाया जाता है। इस तरीके से समाधान = सुख, व समस्या = दुख।
सुखी होना ही मानव धर्म है। धर्म सफलता के लिए समाधान सम्पन्न होना आवश्यक है।
समाधान कैसे मिले ये प्रश्न होता है। इसके उत्तर में मध्यस्थ दर्शन - सहअस्तित्ववाद के आधार पर प्रस्तावित ज्ञान विवेक विज्ञान का संयुक्त रूप में निष्कर्ष निर्णय स्पष्ट होता है, ज्ञात होता है, व्यवहार में प्रमाणित होता है। यही सर्वतोमुखी समाधान का स्रोत है। इस प्रकार ज्ञान, विवेक, विज्ञान, सम्पन्न होना हर मानव की आवश्यकता है।
सत्य अपने स्वरूप में सहअस्तित्व रुपी अस्तित्व में अनुभव ही है। अनुभव ही परम प्रमाण है। इसका धारक वाहक मानव है। दूसरी विधि से मानव का प्रमाण अनुभव ही है। इसीलिए सहअस्तित्व बोध होना अनुभव होना आवश्यक है।
सहअस्तित्व बोध अध्ययन विधि से सफल होता है।
सहअस्तित्व में अनुभव विधि:- सहअस्तित्व सहज अस्तित्व ज्ञान होने के उपरान्त अस्तित्व में अनुभव होने की स्थिति बनती है। अभी जीवन की ही समझ जीवन में होने की आवश्यकता पर यहां तक ध्यान गया कि 10 क्रियायें प्रमाणित होनी हैं।
5 -दस क्रियायें प्रमाणित होने की विधि: -
अनुभव, प्रामाणिकता, अनुभव बोध, प्रमाण को प्रमाणित करने का संकल्प, प्रमाणित करने के लिए चिन्तन, चित्रण और न्याय धर्म सत्य सहज तुलन, उसका विश्लेषण, मूल्यों का आस्वादन, संबंधों का चयन रूप में प्रमाणित होना पाया जाता है।
मानव संबंधों में न्याय के रूप में, प्राकृतिक संबंधों में नियम के रूप में फलीभूत होता है। इस क्रम से प्रमाणित होना तभी सुलभ है जब सहअस्तित्व में जीवन अनुभव करना होता है। इसके लिए सहअस्तित्व बोध होना एक आवश्यकता है। आगे इसका विषद अध्ययन होगा।
सहअस्तित्व समझ में आने के बाद ही जीवन ज्ञान और मानवीयतापूर्ण आचरण सार्थक हो पाता है। यहां ये मान्यता आवश्यक है कि सहअस्तित्व ज्ञान अनुभवमूलक विधि से सम्पन्न होने के उपरान्त ही जीवन की सार्थकता समझ में आती है।
सार्थकता का पहला मुद्दा समझदारी, दूसरा मुद्दा ईमानदारी, तीसरा जिम्मेदारी और चौथा मुद्दा भागीदारी है।