मानव शरीर द्वारा मानव ने कल्पनाशीलता व कर्मस्वतन्त्रता का प्रयोग किया है। यह कैसे कर पाये? क्यों किये? ये प्रश्न होता है। 

इस प्रश्न के उत्तर में मनुष्य शरीर सर्वोच्च विकसित शरीर है। जीवन अपनी जागृति को प्रमाणित करना चाहता ही है सुखी होने के लिए। इसके लिए आधार शिक्षा संस्कार ही है। अभी तक की जो शिक्षा परम्परा में पहचानी गयी है उसमें जीवन के अध्ययन का कहीं अता-पता नहीं है। इसी के साथ- मनुष्य के साथ सभी प्रकार के जीव जीते आये हैं जिसको देखने का मौका सभी मनुष्यों के सम्मुख रहा है इसी आधार पर अर्थात् जीवों के सम्मुख जीने के आधार पर कल्पनाशीलता, कर्म स्वतन्त्रता को प्रयोग किया। 

जीवों में भी संवेदनायें क्रियारत, क्रियाशील रहना देखा जा रहा है, मानव में भी क्रियाशील, प्रभावशील रहना देखा जा रहा है। इसके साथ मानव में यही विशेषता आयी कि मनाकार को साकार करने में सफल हुये। ऐसा मनाकार साकार करते हुए, करने व जीने के लिए जीवन की साढ़े चार क्रियायें पर्याप्त रहीं।  

वह साढ़े चार क्रियायें चयन-आस्वादन, विश्लेषण-आधा तुलन (वृत्ति में तुलन-प्रिय हित लाभ व न्याय धर्म सत्य के रूप में होता है। इसका प्रमाण हर मानव न्याय चाह रहा है) चित्रण क्रियायें संपादित होती हैं।  

इस प्रकार चित्रण, आधा तुलन, विश्लेषण, चयन, आस्वादन साढ़े चार क्रियायें हुई। इतने के साथ जीवों के सदृश संवेदनाओं का प्रयोग और मनाकार को साकार होने की क्रियाकलाप वर्तमान में प्रमाणित हुई | अभी मानव परम्परा में ये दिखता है। 

4 -साढ़े पांच क्रियाओं का स्वरूप प्रमाणित करने की सम्भावना 

तुलन क्रिया में से प्रिय-हित-लाभ सम्बन्धी तुलन को हर व्यक्ति करता ही आया। न्याय-धर्म-सत्य का तुलन कल्पनाओं में प्रमाणित नहीं हो पाया। 

  • न्याय को हम इस प्रकार से प्रमाणित कर सकते हैं कि संबंधों को पहचानने के तरीके से। हर आदमी संबंधों का संबोधन, उच्चारण करता ही है हर देश-भाषा में। उच्चारण में संबोधन के साथ जो संबंध की स्वीकृति रहती है, उन स्वीकृतियों को निर्वाह करने पर विश्वास होना स्वाभाविक है इस प्रकार संबंधों का निर्वाह ही विश्वास का आधार है। 

इसके बाद यही प्रश्न हो सकता है कि संबंधों को निर्वाह करना है या नहीं? सामान्यतः सर्वाधिक मनुष्यों में स्वीकारने निर्वाह करने की ही ध्वनि निकलती है। निर्वाह करने की स्थिति में विश्वास अपने आप में निर्वाह हुआ रहता है। इसका मूल्यांकन होना स्वभाविक है। परस्परता में तृप्ति और साथ-साथ जीने की आवश्यकता स्पष्ट होती है। इस प्रकार संबंधों को पहचानना, मूल्यों का निर्वाह करना, मूल्यांकन करना, परस्पर तृप्ति, यही न्याय का स्वरूप है। 

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