• <strong>भागीदारी का स्वरूप</strong> - मानव के साथ व्यवस्था को प्रमाणित करना व समग्र व्यवस्था में भागीदारी करना।  
  • <strong>जिम्मेदारी का स्वरूप</strong> - मानव संबंध, मानवेतर प्रकृति के संबंध को पहचानना, निर्वाह करना, मूल्यांकन करना व तृप्ति पाना। इसे समझदार मानव ही पूरा कर पाता है। 

अभी तक इस स्थली में ये भी एक प्रश्न होना स्वभाविक है कि क्या अभी हम समझदार नहीं हैं। क्या हम समझदारी का कोई सूत्र नहीं पाये हैं। 

उक्त मुद्दे पर हम पहले ही चर्चा कर चुके हैं। परम्परागत तरीके से प्राप्त दोनों प्रकार की विचारधाराएं अपने में समृद्ध हुए और लोगों ने इसे अपनाया। पूरी निष्ठा से अपनाने के उपरान्त ये समझ आया कि ईश्वरवाद स्वर्ग व मोक्ष का लक्ष्य बनाने, उसके लिए कार्यक्रम के रूप में भक्ति–विरक्ति का स्वरूप प्रस्तुत किया है। ये दोनों रहस्यमयी होने के कारण प्रमाण परंपरा नहीं हो पायी। 

मोक्ष का प्रमाण व स्वर्ग का प्रमाण मानव परंपरा में प्रमाणित नहीं हुआ। किताबों के अनुसार शब्दों-वचनों के अनुसार ये दोनों मिलने का आश्वासन इसमें योग्य प्रक्रियायें बतायी गई हैं। इसमें से एक विधि तप करने की विधि, दूसरा सच्ची भक्ति करने की बात कही है। 

भौतिकवादी विधि से स्वर्ग-नरक व भक्ति-विरक्ति से कोई लेना-देना नहीं रहा। संघर्षपूर्वक संग्रह सुविधा प्राप्त करने की प्रवृत्ति प्रेरणा देती है। इस प्रकार दोनों विधि से मानव को, मानव के साथ जीने, मानव को पहचानने का कोई रास्ता नहीं दिखता। इसी प्रकार के क्रम चलते व्यक्तिवाद-परिवारवाद और समुदायवाद तक लोगों ने सोचा। 21 वीं सदी तक सभी समुदाय असुरक्षा के चक्कर में आ गये। प्रदूषण के आधार पर प्राकृतिक प्रकोप बढ़ गये। इन दोनों प्रकार के संकटों से उद्धार के लिए मध्यस्थ दर्शन-सहअस्तित्ववाद प्रस्ताव के रूप में प्रस्तुत हुई है। 

मानव समझदार होने के उपरांत, मानवीयतापूर्वक समग्र व्यवस्था में भागीदारी करता है। इस वर्तमान में मानव का अध्ययन पंच कोटि में होता है। 

  • अमानव दो कोटि में होते हैं – पशु मानव व राक्षस मानव  
  • मानव एक कोटि में होते हैं – मानव 
  • अतिमानव दो कोटि में होते हैं - अतिमानव कोटि में देव मानव व दिव्य मानव 

इनका निश्चयीकरण उनके आचरणों में पाये जाने वाले दृष्टि, प्रवृत्ति व स्वभाव के आधार पर निश्चित होता है। 

अमानव कोटि:-

स्वभाव - दीनता हीनता क्रूरता का होना पाया जाता है। 

  • प्रवृति - चार विषयों में होना पाया जाता है। (आहार, निद्रा, भय, मैथुन) 
  • दृष्टि - प्रिय, हित, लाभ 
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