• पशुमानव दीनता प्रधान व राक्षस मानव क्रूरता प्रधान होते हैं। 

मानव :- 

स्वभाव धीरता, वीरता, उदारता, दया, कृपा करुणा के पक्ष में होता है। 

  • प्रवृत्तियां- पुत्तेष्णा (धनबल), वित्तेषणा (जनबल), लोकेषणा (यशबल) कामना के रूप में देखा जाता है। 
  • दृष्टियाँ - न्याय प्रधान धर्म व सत्य दृष्टि के रूप में होना पाया जाता है । 
  • जनबल कामना - संतान के रूप में, संतान मानव परंपरा के रूप में सार्थक होना। 
  • धनबल कामना - परिवार में उपयोग के आधार पर समाज में सदुपयोग के आधार पर व्यवस्था में नियोजन, प्रयोजनशीलता के आधार पर सार्थक होना। 
  • यश बल कामना- दूर-दूर तक पहचान के आधार पर व्यवस्था में भागीदारी होने के आधार पर सार्थक होता है। 
  • <strong>देवमानव :-</strong>

स्वभाव – दया प्रधान कृपा करुणा और धीरता वीरता उदारता के रूप में होना पाया जाता है।  

दृष्टियां – धर्म प्रधान सत्य व न्याय के रूप में होने पाया जाता है।  

  • प्रवृति – लोकेषणा के रूप में होता है। 
  • <strong>दिव्यमानव :-</strong>
  • स्वभाव - करुणा प्रधान धीरता वीरता उदारता दया कृपा के रूप में होता है। 

दृष्टियाँ - सत्य दृष्टि या सत्य प्रधान धर्म व न्याय दृष्टि होती है। 

प्रवृत्ति - केवल परम सत्य रूपी सत्य होती है। परम सत्य रूपी सहअस्तित्व को प्रमाणित करना ही होती है। 

  • न्याय - संबंधों की पहचान, मूल्यों का निर्वाह, मूल्यांकन परस्पर तृप्ति के रूप में वर्तमान 
  • धर्म - सुख, सुखी होने के लिए समाधान, समाधान के लिए समझदारी 
  • सत्य – सहअस्तित्व रूपी अस्तित्व, सत्ता में संयुक्त जड़-चैतन्य प्रकृति 
  • धीरता - स्वयं न्याय के प्रति दृढ़ता को प्रमाणित किये रहना 
  • वीरता - दूसरों को न्याय दिलाने में तन मन धन का उपयोग करने वाला 
  • उदारता - तन मन धन रूपी अर्थ का सदुपयोग सुरक्षा करना
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