• दया - पात्रता के अनुरूप वस्तु को सुलभ करने वाले प्रवृति व प्रमाण 
  • कृपा – वस्तु के अनुरूप पात्रता को प्रमाणित करने वाला प्रवृति व प्रमाण 
  • करुणा – पात्रता व वस्तु के अनुरूप सुलभ करने वाली प्रवृति व प्रमाण 

प्रवृत्ति :-

मानव में पुत्तेषणा, वित्तेषणा, लोकेषणा  

  • देव मानव में लोकेषणा  
  • दिव्य मानव में सहअस्तित्व को प्रमाणित करना ही प्रवृत्ति के रूप में होना पाया जाता है। 
  • <strong>6 - मानवीय आचरण: मानव में मानवत्व प्रमाणित होता है</strong>

मानव में मानवत्व मानवीयतापूर्ण आचरण के रूप में प्रमाणित होता है। त्व का अर्थ ही है आचरण। दूसरी विधि से त्व के रूप में ही आचरण सहित हर होने की वस्तु को पहचाना जाता है। इस प्रकार स्व व त्व अविभाज्य रूप में वर्तमान है। स्व का मतलब होना, त्व का मतलब है आचरण होना। 

इस प्रकार स्व, त्व अविभाज्य रूप में वर्तमान है। इसी विधि से मानव भी स्व व त्व के साथ अविभाज्य वर्तमान होना स्वभाविक है। भ्रमवश अर्थात् जीवों के सदृश जीने की अपेक्षा के आधार पर पशु मानव राक्षस मानव के रूप में गण्य हुआ। ये स्वयं अर्थात् पशु व राक्षस मानव को भी अधिकांशतः स्वीकृत नहीं है। हर पशु मानव व राक्षस मानव भी सुखी होना चाहता है। सुख के लिए मनाकार को साकार करना के उपरान्त भी सुखी होने का प्रमाण परम्परा के रूप में अभी नहीं हुआ इसीलिए मन: स्वस्थता को अपनाना आवश्यक हो गया।  

इसी क्रम में सहअस्तित्व रूपी अस्तित्व का अध्ययन संभव हुआ। फलन के रूप में जीवन का अध्ययन, मानवीयतापूर्ण आचरण स्पष्ट होता है। 

मानवीयतापूर्ण आचरण :- 

मूल्य चरित्र नैतिकता के संयुक्त मूल्य रूप में मानवीयतापूर्ण आचरण को पहचाना जाता है। मूल्यों को प्रमाणित करने के लिए संबंधों का होना आवश्यक है। संबंध के लिए भ्रमित अवस्था से भी संबोधन के रूप में स्वीकार चुके हैं। संबंध प्रधानतः सात रूप में संबोधन करने में आता है। हर भाषा देश परिवार में यह स्पष्ट है।

माता पिता,

भाई-बहन,

Page 97 of 106
93 94 95 96 97 98 99 100 101