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भाग – 1

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जिज्ञासा: इतिहास से लेकर आज तक दो तरह की विचारधाराएँ मानव जाति के इतिहास में रही हैं, एक ईश्वरवादी विचारधारा। ईश्वर को केंद्र में मान कर सारी बातों को व्याख्यायित करने की और दुनिया को एक समाधान देने की कोशिश। और दूसरी विचारधारा जो इसकी प्रतिक्रिया के फलस्वरूप पैदा हुई- वो है जिस को हम भौतिकवादी विचारधारा कहते हैं, कि मनुष्य है, उसकी कुछ आवश्यकताएं हैं, अगर उनकी पूर्ति हो जाए तो आदमी सुखी हो जाएगा और अधिक मात्रा में उसको संग्रह करके ज़्यादा सुखी हो जाएगा। इसके तहत भौतिकवाद की अपनी बहुत लंबी चौड़ी विसंगतियाँ रहीं- संग्रह, शोषण, संघर्ष, युद्ध। ऐसा करते हुए हम लोग atomic युद्ध के दरवाज़े पर आ गए, जहाँ सारी दुनिया के सामने एक फुफकारता हुआ सवाल आकर के खड़ा हो गया कि मनुष्य ऐसी स्थिति में जीवित बचेगा कि नहीं बचेगा। तो एक बार जब सम्पूर्ण मानव जाति और इस धरती को इस संकट में हम पाते हैं और इन दोनों विचारधाराओं के द्वारा मनुष्य को जिस समाधान की प्राप्ति, एक सम्पूर्णता का अनुभव जो होना चाहिए था आज तक हुआ नहीं। श्री नागराज जी बाबा हमारे बीच मौजूद हैं। उन्होंने बिल्कुल एक दूसरा ही विकल्प दिया, वो ना तो भौतिकवाद है, ना ही अध्यात्मवाद है और ना ही दोनों का मिश्रण है, जिसको उन्होंने मध्यस्थ दर्शन सहअस्तित्ववाद नाम दिया। आज उनके जीवन में अनुभव किए हुए बिंदुओं जिसको मध्यस्थ दर्शन के रूप में मानव जाति के सामने रखा, उन कुछ बिंदुओं के ऊपर आज हम बाबाजी के साथ बातचीत करेंगे।

बाबा जी, इन दोनों विचारधाराओं की बहुत गहरी जानकारी और उसका एक गहरा पड़ने वाला असर आपकी जिंदगी में रहा, जब आप हम लोगों की तरह नौजवान थे आपने महसूस किया, तो ऐसी क्या परिस्थितियाँ थीं और क्या वो बातें थीं जिनकी वजह से आपको एक विकल्प को खोजना पड़ा और आपने अपना परिवार, घर-बार, कारोबार सब कुछ छोड़कर आप अमरकंटक के बीहड़ों में आ गए और आप इस अनुसंधान में प्रवृत्त हुए? उस पृष्ठभूमि को हम लोग जानने की जिज्ञासा रखते हैं।

उत्तर: आपने ऐसा कुछ बात कहा है जो अत्यंत सम्मानजनक जिज्ञासा, जैसा होना चाहिए, ऐसा मुझको समझ में आया। ये स्वागतीय है। इसका एक अच्छे ढंग से लोक हृदय तक पहुँचने योग्य उत्तर भी होना चाहिए, ऐसा मैं सोचता हूँ। यदि पूरा लोगों को समझ में आता है, ये क्यों ऐसा प्रयत्न किए, कैसा पा गए, दोनों बात का उत्तर यदि लोगों में छूता है, यह पूरा बात को समझने में मदद होगी, ऐसा ही मैं विश्वास करता हूँ। आपका प्रश्न का यह सम्मान है। मूल में यह बहुत भारी हमारा पसीना बहाने वाली बात तो नहीं थी मेरे अनुसार। एक सहज विधि से यह बात घटित हो गयी। एक तो मैं अपने ही संस्कार से कहिए, जीवन सहज विधि कहिए, बड़े बुजुर्गों का आशीर्वाद कहिए, परम्परा का आशय कहिए, मैं एक किसी वेदमूर्ति परिवार में यह शरीर यात्रा शुरू किया। वेदमूर्ति परिवार का मतलब यही है, क़रीब तीस चालीस वर्ष तक वेदाध्ययन अभ्यास करते हैं और उसके बाद वे वेदमूर्ति कहलाते हैं, उनकी कीर्ति पूरा देश में फैलती है। सब लोग को विदित होता है वे वेद मूर्ति हैं। जब भी कोई पूछते है उसी पहचान से उनको सम्मान करते हैं, उससे वे सब संतुष्ट रहते हैं। इसको हम देखते रहे। यह तो हमने वेदमूर्ति का मतलब बता दिया। ऐसे परिवार

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