ही, मैं ऐसा अपना तर्क भिड़ाया। भिड़ा करके देखते हैं अभी तक गुड़ खाया हुआ गूँगा लोग देखे हैं, हम बात करने वाला देखेंगे, क्या होता है परिणाम। उसके आधार पर हम जाँच करने के लिए एक एकांत स्थली को सोचा, भारत में अमरकण्टक ठीक लगा और इसमें आकर के हम अपना प्रयत्न किए। प्रयत्न करने से संयोग से ये पूरी की पूरी बात जो हम अभी आपको बता रहे हैं, ये पूरी बात हम अस्तित्व में अध्ययन किया हुआ, अनुभव किया हुआ, उसको अभिव्यक्ति सम्प्रेषणा में हम प्रस्तुत करने योग्य हुआ, तब हम इस प्रकार की चीख चिल्लाना शुरू किए। ये कुल मिलाकर के एक घटना विधि से ये चीज़ आ गयी।

अब जब ये हमको मिल गई, इसमें बंधन और मोक्ष का कारण स्पष्ट हुई। हम स्वयं मानव को जीवन और शरीर के रूप में अध्ययन किया। जीवन एक गठनपूर्ण परमाणु के रूप में होना हम अध्ययन किया। गठनशील परमाणु के रूप में रासायनिक भौतिक संसार कार्य करता हुआ हमने देखा है। इसको अच्छी तरह से हमने अध्ययन किया। अध्ययन करने के बाद गठन पूर्ण परमाणु ही जीवन के रूप में काम करता है, इसमें ही आशा, विचार, इच्छा, संकल्प और प्रमाण, ये प्रस्तुत होते हैं, ये हमको समझ में आया, उसको हम सटीक प्रस्तुत करने की कोशिश किए। अभी आपके सामने प्रस्तुत करता हूँ। और इसमें कई लोग अच्छे गहरे से सोचते भी हैं, कुछ लोग धीरे-धीरे से भी सोचते हैं, यह दोनो तरीके चल ही रहा है, आप हम इसे देख ही रहे हैं।

यह जीवन भ्रमित होकर के, भ्रमित का मतलब जीवन जीव चेतना से जीव चेतना पूर्वक जीना शुरू करता है, यह जीव चेतना विधि में जी कर अपने को अच्छा मानने लगता है, जीवों से। क्योंकि मनुष्य ने मकान बना लिया, अपने को जीवों से अच्छा माना, कपड़ा पहन लिया, जीवों से अच्छा मान लिया, सड़क बना लिया, गाड़ी बना लिया- ये सभी विधा से मनुष्य जो है ना जीवों से अपने को अच्छा माना। ये हमको समझ में आया। किंतु मनुष्य जो है ना ज्ञानावस्था में होना हमने पढ़ा है प्रकृति में, और मानव ज्ञान के पास पहुँचा नहीं। ज्ञान के पास पहुँचने के लिए इसमें प्रावधान हो गयी। क्या प्रावधान हो गयी भई? जीवन ज्ञान होना, अस्तित्व दर्शन ज्ञान होना, मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान होना, यह तीनो चीज़ मुझको स्पष्ट हुई। उसको हम आचरण करके देखा, यह प्रमाणित होता है। प्रमाणित होने के बाद क्या बात कहना? झाड़ में चढ़ कर चिल्लाना शुरू किया। इस ढंग से ये पूरे बात कही। मैं अपने में अनुभव करना, प्रमाणित करना जी कर और उसके बाद दूसरों को बताने की विधि से हम प्रवृत्त हुए। हक़ीक़त इतनी ही है।

जिज्ञासा: बाबाजी, आपने अपने मानव व्यवहार दर्शन में उद्घोष लिखा है, जीने दो और जियो। आज से २६०० वर्ष पहले भगवान महावीर ने जियो और जीने दो, ऐसा सूत्र दिया था। क्या गलती से आपने उसको उल्टा कर दिया? या सुविचारित इसके पीछे कोई पृष्ठभूमि है और आपका अनुभव है जिसके वजह से आप ने इस सूत्र को “जीने दो और जियो” इस रूप में मनुष्य जाति के सामने रखा?

उत्तर: एक ‘होनी’ की बात रही इसमें। आपने जिस तरीके से प्रश्न किया- महावीर स्वामी ने २००० वर्ष पहले अपनी दिव्य वाणी में जीने दो जियो कहा था, तुमने कैसे इसको उलट दिया, ये आपने पूछा। ये पूछने का बिंदु भी है, एक प्रकार से इसको पूछना भी चाहिए। इसमें प्रतिक्रिया वाद कुछ भी नहीं रहा। महावीर स्वामी बड़ी गलती किया, ऐसा कोई हमारा मन में थी नहीं। हमारा मन में जो आई, प्रमाण के आधार मैंने लिखा। हम प्रमाणित होने के लिए दूसरे को जीने देना बनता ही है। जीने दिए बिना, हम समझा हुआ है इसका प्रमाण होते ही नहीं। अच्छा, अब मैं यह कह

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