में हम जब शुरुआत किए हैं शरीर यात्रा, गोद से, पलने से, पेट से ही शुरू किया होगा, यह तो स्वाभाविक बात ही है। यह सब होते-होते एक किसी आयु, चार पाँच वर्ष आता है, उस अवधि में बड़े बुजुर्ग, बहुत सारे लोग हम को प्रणाम करते रहे। मेरा पहला प्रश्न यही हुआ कि भाई इनको हम क्या दे दिया हूँ ये हमको क्यों प्रणाम करते हैं। इतना ही प्रश्न है कुल मिलाकर के। अभी यहाँ तक आने का भी, मूल में हम मानता हूँ। मेरे मन में ऐसा ही आता है इतना ही प्रश्न है, इसका उत्तर पाने का ही हमने पूरा प्रयत्न किया। प्रयत्न में एक खूबी यह रही कि हमको जब प्रणाम करते हैं हम अपनी अहमता को बढ़ा सकते थे, कि बड़े बुजुर्ग हमको प्रणाम करते हैं, ऐसे हम आदमी हूँ। पहले ऐसा हो सकता था, ऐसा नहीं हुआ।
उसके बाद हमारा परिवार इनको क्या दिए जिसके लिए ये हमें प्रणाम करते हैं। दस ग्यारह वर्ष तक ये परिस्थिति आयी कि ये हमारे परिवार का सम्मान करते हैं। उसके बाद हमारा परिवार संसार को क्या दिया, इसको हम शोध करना शुरू किए।
तो हमारे परिवार में क़रीब हज़ारों वर्षों की इतिहास सुनाते रहे कि हर एक पीढ़ी में एक दो व्यक्ति सन्यासी होते रहे। उसमें से कई सन्यासी ऐसे हुए हैं, हमारे परिवार परंपरा में, कि अपनी समाधि के लिए गड्ढा स्वयं ही खोद लिया, उसके अंदर बैठ गए, अपने हाथ से माटी ढाक लिए और मर गए। उसके ऊपर चबूतरा ही उस जगह पर बना कर रखे थे। ये सब हम देखा हूँ, सुना हूँ। वो सुनने के बाद यह आने लगा कि हमारा परिवार संसार को क्या दिया। उसको सोचने के लिए शुरुआत किया मैंने कि मुझको क्या दे गए। उसका अंत में हमारे बुजुर्गों ने यह ही कहते रहे, शास्त्र ही प्रमाण है, शास्त्र के आधार पर ही तुमको सोचना पड़ेगा।
अब शास्त्र को हम अध्ययन करना शुरू किया और वेदांत को पढ़ा तो पता चला कि ब्रह्म ही बंधन और मोक्ष का कारण है। पहले ये बताते हैं कि ब्रह्म जो है व्यापक है और उसके बाद उसका परछाई माया पर पड़ी, माया पर पड़ने पर जीव पैदा हुई। जीव कारुण्यवश, ब्रह्म जो है ना आत्मा के रूप में सभी के हृदय में बैठ गयी। वाद विवाद में जनक के समय में एक वाद विवाद किए हैं, उस समय में उसका कोई हल नहीं निकला। उस अभियान को नाम दिया है "शेषं कोपेन पूरयेत्"। अंत में इस प्रकोप से नाराज़गी से अंत हुई, ये उस अभियान को नाम दिया। ये सब तो पीछे गुजरी हुई बातों को हम सुने हैं। उसके बाद हम स्वयं सोचने लगे, ब्रह्म ही बंधन और मोक्ष का कारण कैसे हो सकता है? एक आदमी सामान्य अच्छे व्यक्ति को सोचते हैं- गला काटने वाला गला जोड़ता नहीं, गला जोड़ने वाला गला काटता नहीं है। ये कैसे माना जाए इतनी बड़ी अच्छी चीज़, ये दोनो धंधा कर देता है। ऐसा हम अपने बड़े बुजुर्गों से जब वाद-विवाद करने लगे, वे कहने लगे यह ब्रह्म लीला है, तुमको इसमें प्रश्न करने का अधिकार नहीं है। मैंने कहा कि हर दारू पिया हुआ आदमी लीला करता है, हर गांजा पिया हुआ आदमी लीला करता है, हर पागल आदमी लीला करता है। यहाँ तक लीला करता है कि अपना घर को भी तोड़ देता है। क्या ये सबको सच माना जाए? ये पूछा तो बोले तुम जो है अतिवादी हो , छोटे मुँह में बड़ी बात करते हो। क्या किया जाए फिर? ये बताया हमारे बड़े बुजुर्गों ने कि तुम को इस पर सोचना पड़ेगा, अनुभव करना पड़ेगा। अनुभव कैसा होता है, उस विधि में यह ही कहा कि समाधि, संयम में अनुभव होगा। और किताबों में लिखा ही था- जो समाधि संयम में जो ज्ञान होता है उसको बताया नहीं जा सकता, वो अव्यक्त ही रहेगी। ये दोनों बात पहले से हमको लिख कर दे दिया, माने लेख रूप में लिख कर दे दिया है। ये सब को हम पढ़े ही थे। उसके आधार पर देखते हैं यदि हो सकता है। उसमें गुड़ खाया हुआ गूँगा कहा था, हमारे शास्त्रों में लिखा है। तो गुड़ खाया हुआ तो गूँगा है, बात करने वाला यदि गुड़ खाएगा तो बात करेगा