फलस्वरूप हम दुखी हुए। वो दुःख मुक्ति के लिए इसको प्रस्तुत किया है। दुःख मुक्ति कैसे होगा भाई? समझ के जिया करो, समझ के किया करो, समझ के बोला करो। ये बात यहाँ से शुरू किया।
आगे एक ऐसे ही चीज़ आता है- “जाने हुए को मान लो, माने हुए को जान लो”। सब इसी से जुड़ी हुई बातें हैं। तो भूमि स्वर्ग होने के पश्चात इसके आगे की कड़ी ऐसे जुड़ता है- सभी के साथ हम जीते हैं, मतलब जीवों के साथ भी जीते हैं और वनस्पतियों के साथ भी जीते हैं, खनिजों के साथ भी हम जीते हैं। इन सबके साथ संतुलन रूप में जीना बनता है तभी धरती स्वर्ग होगी। इनके साथ हम अभी विरोध से जी रहे हैं, इसीलिए हम संकट को मोल रहे हैं। कुल मिला के आशय क्या है? हम जो पहले बताया जीने दो और जियो- उस प्रकार की चेतना निर्मित होने के लिए यह मंगल कामना किया है। मानव, जीव चेतना से मानव चेतना में परिवर्तित हो, वहाँ से देव चेतना दिव्य चेतना में प्रमाणित हो, जिससे इस धरती में देवता के रूप में मानव प्रतिष्ठित हो। इस मंगल कामना को किया है।
जिज्ञासा: ये जो अंतिम बात है बाबा “नित्यम् यातु शुभोदयम्”?
उत्तर: “नित्यम् यातु शुभोदयम्” क्या शुभ हुआ ? ये चारों अवस्था में संतुलन शुभोदय, नित्य शुभोदय। माने पदार्थ, प्राण, जीव और ज्ञान अवस्था की चार अवस्थाएं बनी हुई हैं, इन सब में तालमेल, एक संतुलन, एक नियम, एक न्याय, ये सब चीज जीवित रहने से ये संतुलित रहेंगे ही। संतुलित रहने पर निरंतर शुभ ही उदय होती रहेगी। यानी वन जाएँगे वहाँ भी शुभ, घर आएँगे वहाँ भी शुभ, सड़क चलेंगें वहाँ भी शुभ, संकट का कारण ही नहीं है। अभी कहीं भी जाओ संकट के अलावा दूसरा कुछ है ही नहीं। इतनी सी बात है।
संकट से घिरे रहना है, तब तो हम परम्परागत विधि से जो कुछ भी किए उसको बनाए रखना चाहिए, संकट से मुक्ति पाना है, तब तो इस प्रस्ताव को अध्ययन करके देखना चाहिए और इसमें यदि सर्वशुभ होने की बात आता है, जैसा कामना किया, इसको अपनाना चाहिए। यही निकलता है।
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