उड़ा नहीं रहे हैं। ये अपने आप में स्वयं स्फूर्त विधि से सभी काम कर रहे हैं, इस पर हम विश्वास रख सकते हैं। इससे क्या फायदा पूछो- मनुष्य भी अपने में स्वयं स्फूर्त विधि से व्यवस्था में जी जायें। यही मंगल कामना पहले ही रखा है। कब होगा शुभ? मानव जब व्यवस्था में जिएगा। उसके पहले शुभ घटित होने वाला नहीं है। और सर्व शुभ की जगह में सर्व के लिए अनिष्टकारी कार्य में आदमी जात लग गया, इसलिए प्रकारांतर से हम सभी अपराध के कटघरे में आ गए हैं। इसको अच्छे ढंग से यदि परीक्षण किया जाए तो कोई आदमी धरती में बचेगा नहीं, सभी फंसेगा। फंसा ही है। अब उसको छूटने के लिए प्रस्ताव रूप में एक छोटा सा काम शुरू किया। इसमें आप सब स्वतंत्र हैं और बहुत अच्छे ढंग से समझने योग्य हैं, सच्चाई को समझने की तीव्र इच्छा आप लोगों में बनी हुई है, जिसको मैं देखता हूँ। तो वो सफल हो ऐसा मैं कामना करता हूँ, कामना करते हुए इस पूरे बात को आपको समझाते तक एक निश्चित तरीका अपनाया हूँ उस तरीके से हम समझा देता हूँ।
जिज्ञासा: बाबा पाँचवा बिंदु है उपदेश- जाने हुई को मान लो, माने हुए को जान लो।
उत्तर: अनुभव के बाद ये पता चला, हम अभी तक क्या सोचते आये हैं कि करके सीखो, परंपरा में यही करते आये हैं और ईश्वरवाद भी वही बोला और ये (भौतिकवाद) भी बोला। दोनों यही बोले। पहले ईश्वरवाद बोले “आचारः प्रथमो धर्मः, विचारस्तदनन्तरम्”। आचरण के बाद विचार करना। अभी, पहले नहीं करना कहा। उसमें बिलकुल सरशब्द व्यतिरेक ये दिखा कि विचार के बिना कोई आचरण कर ही नहीं सकता। यहाँ निकल गए, तो हमको बताया गया कि तुम अतिवादी हो, छोटे मुंह में बड़ी बात करते हो, ये सब हमारी परंपरा ने हमको तोहफा दिया। उसके बाद हम ये सब किये हैं। इसके बाद हम ये प्रस्तुत किया है, भाई अब समझ के करो। अब जो कुछ भी शेष ताकत धरती में है उसको बचाने के अर्थ में हम यह कर सकते हैं, समझ के यदि काम करना शुरू करते हैं, सोचना शुरू करते हैं, और प्रमाणित करना शुरू करते हैं, फल परिणाम को पाना शुरू करते हैं, धरती में यदि ताकत बचा होगा अपने में ही सुधार लेगा। ऐसा शुभेच्छा से इस प्रस्ताव को रखा। इसमें क्या होगा- जाने हुए को मान लो, माने हुए को जान लो। दोनों स्थिति में समझ के ही करने की स्थिति बनती है।
जिज्ञासा: बाबा जाना हुआ और माना हुआ में क्या अंतर् है?
उत्तर: अभी भ्रमित संसार में इसमें व्यतिरेक है, जाग्रत संसार में कोई व्यतिरेक नहीं है। अभी हम माँ कहते हैं, पिता कहते हैं, मित्र कहते हैं, बंधु कहते हैं, और संबंधों का उच्चारण करते हैं। क्या आजीवन निर्वाह हो पाता है क्या ? पूछा जाये तो कितने लोगों में निर्वाह हो पता है, उसको सोच लो। ये जीव संसार के काम है। जीव संसार में हम लोगों ने देखा है, गाय बच्चा देती है, उसे कोई आदमी यदि छू दिया उसको मारे बिना वो छोड़ेगा नहीं। दो दिन के बाद वो मारने वाला बात कम हो जाता है। चार दिन के बाद मारना भूल जाता है। अपने बच्चे के संरक्षण में सब कुछ करने के लिए तैयार रहता है, जब वो बच्चे को दिया रहता है। तो इस प्रकार से पशु संसार में भी ममता का थोड़ा बहुत लगाव थोड़े दिन के लिए दिखता है, वो ममता मानव में शरीर यात्रा पर्यन्त रहना है। पर्यन्त रहने के लिए क्या हुआ? जाना हुआ को मान भी लिया और माना हुआ को जान भी लिया। जैसा- पुत्र को कौन नहीं जानता है, पुत्र किस प्रयोजन के लिए है उसको हम पहचाना नहीं है, मानव परंपरा। अभी तक परंपरा क्या सोचा, ईश्वरवादी परंपरा ये सोचा-