भाग – 2

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जिज्ञासा: बाबा जी मध्यस्थ दर्शन के मूल तत्व में तीसरा है- अनुभव ज्ञान। सत्ता में सम्पृक्त जड़ चैतन्य प्रकृति, सत्ता अर्थात व्यापक में सम्पृक्त जड़ चैतन्य इकाइयाँ अनंत। व्यापक पारगामी व पारदर्शी, सत्ता में संपृक्त सभी इकाइयाँ रूप, गुण, स्वभाव व धर्म संपन्न, त्व सहित व्यवस्था, समग्र व्यवस्था में भागीदारी के रूप में हैं। बाबा इसका क्या आशय है? 

उत्तर: इस बात को लिखा है- अनुभव पूरा क्या किया, मैंने। इस बात को वहाँ सत्यापित किया है। अनुभव मैंने क्या किया, उसको सत्यापित किया है, यह संसार के लिए सूचना है। अभी जो आप-हम सत्संग कर रहे हैं, ये ह्रदय स्पर्शी विधि से होने के लिए सत्संग कर रहे हैं। तो इसमें मूल वस्तु है- सत्ता में सम्पृक्त प्रकृति। सत्ता के बारे में मैंने देखा है- यह [सत्ता] सर्वत्र एक सा विद्यमान, सुखप्रद होना देखा गया, नित्य प्रतिष्ठा के रूप में देखा गया। इसमें रद्दो बदल, कमीबेशी का काम नहीं है। यहाँ ज़्यादा वहाँ कम ऐसा कुछ नहीं है। सभी पूरा जड़ चैतन्य प्रकृति में पारगामी है, पारदर्शी है। पारगामी होने के फलस्वरूप भीगा हुआ होना समझ में आया और डूबे रहने से घिरा हुआ भी समझ में आ गयी। इस ढंग से भीगा, डूबा, घिरा रूप में सारे प्रकृति को व्यापक वस्तु में देखा। डूबा हुआ है, घिरा हुआ है- व्यापक वस्तु, हर वस्तु के सभी ओर, और भीगा हुआ है- हर एक वस्तु। उसके सूक्ष्म-सूक्ष्मतम और बड़े से बड़े चीज़ों को देखा है, सभी भीगे हैं। जैसा सूक्ष्म से सूक्ष्म वस्तु की ओर जाते हैं, परमाणु अंश नाम की चीज़ मिलती है। ये आँखों से देखने के लिए कितने लोगों को मिला हम नहीं जानते हैं, किंतु मैंने अनुभव किया है कि सूक्ष्म से सूक्ष्म वस्तु के रूप में परमाणु अंश होते हैं। उनकी प्रवृत्ति परमाणु में व्यवस्था के रूप में काम करने की बना रहता है, ये भी मैंने देखा है। ऐसे परमाणु अंश भी भीगा रहता है, डूबा रहता है, घिरा रहता है। उसमें लिखा है, व्यवस्था का प्रकटन परमाणु के बाद ही है। परमाणु, परमाणु से रचित रचनाओं के साथ ही व्यवस्था का प्रकटन है। इसके पहले के स्वरूप में परमाणु अंश में क्या प्रकट हुआ- परमाणु के रूप में गठित होने की प्रवृत्ति प्रकट हुई। एक सिद्धांत आया है -हर एक प्रकटन के पीछे की स्थिति में उसका बीज निहित रहा।कोई स्थिति प्रकट होने के पहले उसके मूल रूप में उसका बीज निहित रहता है। इसी प्रकार से परमाणु अंश में व्यवस्था के रूप में होने का प्रवृति समाहित रहती है। फलस्वरूप कम से कम दो परमाणु अंश एक दूसरे को पहचानते हैं, एक बीच में रहते हैं, एक चारो तरफ चक्कर लगाते रहते हैं। तब वो अपने निश्चित आचरण को बता पाते हैं। अकेले परमाणु अंश अपने में एक निश्चित आचरण को बता नहीं पता है। इस से निश्चित आचरण को प्रमाणित करने में क्या आ गयी- पूरकता, उपयोगिता। उसकी उपयोगिता भी होगी पूरकता भी होगी। पूरकता मायने दूसरे परमाणु के लिए क्या देगा, यह भी पता लग गयी। इस ढंग से एक परमाणु की अवस्था और यथास्थिति दूसरे परमाणु की अवस्था और यथास्थिति के लिए प्रेरक, इस ढंग से बन गई। इस ढंग से बन कर के अनेक प्रजाति के परमाणु हुए। अनेक प्रजाति के परमाणु जो बनी वो सबका सब डूबे हैं, घिरे हैं और भीगे हुए हैं। इस ढंग से मैंने देखा। अब उसके बाद परमाणु के पूरे बात को देखा तो केवल भौतिक क्रिया, रासायनिक क्रिया, जीवन क्रिया के रूप में कार्य करते हुए देखा। तीन ही प्रजाति की क्रिया है इसमें। जीवन क्रिया का यही काम है- जागृति क्रम, जागृति। और ये जो बाकी रासायनिक, भौतिक क्रियाएं हैं- विकास क्रम, विकास में कार्य करता हुआ मिलता है। ये सब विकास क्रम, विकास ना हों, विकास क्रम न हों, विकास हो, ऐसा कुछ नहीं होता। विकसित

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