सकता हूँ महावीर स्वामी दूसरे महावीर स्वामी के रूप में परिवर्तित नहीं हुए। इसमें मैं जो समझा हूँ वो समझदारी ७०० करोड़ आदमी तक पहुँच सकता है। इस आधार पर जीने दो जियो को लिखा है। जीने दिया तब हम जीने का प्रमाण हुए, इस आधार पर जीने दो जियो लिखा है। समझदारी के बाद हम प्रमाणित हुए, इसका क्या प्रमाण? हम आप तक पहुँचाए। आपको ये बात को समझा दिया, आपने इस बात को समझ लिया, आप दूसरे को समझा लेंगे, तब यह जीने दो जियो परंपरा शुरू हुआ। इसके पहले नहीं होता है। ये कैसे? ऐसा हमारे अनुभव से इस विधि से इसको रखा। इसमें बहुत सारी बहुत बड़ी भारी तर्क-वर्क भी कम है, किंतु तर्क यहीं तक है, मैंने अनुभव किया है, मैं प्रमाण हूँ, इस बात का प्रमाण दूसरे आदमी जब तक तैयार नहीं हुआ तब तक हम प्रमाण हुआ, इसका क्या मतलब है? इसी ढंग से जो हम घोषणा किया है, हम जो समझा हूँ, उसको दूसरा आदमी समझ सकता है, या सभी आदमी समझ सकते हैं, ज्यादा आदमी समझ सकते हैं, इस बात का घोषणा किया है। उसके आधार पर यदि वो समझते हैं, वो दूसरों को समझा पाते हैं, तब हमारा जो है ना जीने देने का प्रमाण पूरा हो गया। इस आधार पर लिखा हूँ।
जिज्ञासा: बाबा आपने अपनी मंगल कामना में लिखा है: भूमि स्वर्गताम् यातु, मनुष्यो यातु देवताम्, धर्मों सफलताम् यातु, नित्यम् यातु शुभोदयम्। भूमि स्वर्ग हो, मनुष्य देवता हो, धर्म सफल हो, नित्य मंगल हो। आपने एकदम अपने दर्शन की शुरुआत में ही इस मंगल कामना को रख कर इसको ज़रूर ही ज़्यादा महत्व दिया है, इसका क्या आशय है? हम लोग थोड़ा विस्तार से समझना चाहते हैं।
उत्तर: ये सामान्य ही है, इसमें कोई ख़ास बात नहीं है। पहले एक बात कहा है- उद्घोष- क्या कहा है? ‘जीने दो जियो’। अभी पूरा बात जो है जीने देने के अर्थ में ही हम प्रमाणित होने के रूप में पूरा प्रतिपादन है यह। वो प्रतिपादन होते समय में धरती में आदमी यदि ऐसा जिएगा तब क्या होगा, कहा- धरती स्वर्ग होगी। अभी रहस्यमयी स्वर्ग के बारे में हमारे बुजुर्गों ने बहुत आश्वासन दिया था, उसके बदले में यह धरती स्वयं स्वर्ग होगी, मनुष्य देवता होगा। कैसा होगा- मैंने यह अनुभव किया हूँ- जीव चेतना से मानव चेतना श्रेष्ठ है, मानव चेतना से देव चेतना श्रेष्ठ है, देव चेतना से दिव्य चेतना सर्वश्रेष्ठ है। इस बात को मैंने अनुभव किया है। तो मानव चेतना में जब परिवर्तित हो जाते हैं तब धरती में मानव झगड़ा, लड़ाई, धोखा-धड़ी जितने भी मानव विरोधी बात है, वो सब से मुक्त होगा। धरती को घायल करने वाला कार्यक्रम बंद होगा। धरती ही जब नाश की ओर जा रहा है, मनुष्य कहाँ रहेगा? धरती बचे बिना धरती पर मानव कैसे रहेगा? इसके आधार पर यह लिखा है- यह धरती स्वयं स्वर्ग होगा। ऐसा कब होगा? प्रमाणित व्यक्तियों का प्रचुरता होने के बाद यह धरती स्वयं स्वर्ग होगी। मनुष्य देवता के स्वरूप में ही मिलेगा, देव चेतना में ही मिलेगा। मानव चेतना तक अपने को प्रयास है, उसके बाद देव चेतना एक स्वाभाविक क्रिया है और दिव्य चेतना एक स्वाभाविक क्रिया है। ये स्वाभाविक रूप में आते ही हैं। तो देव चेतना और दिव्य चेतना में जीने के जो जीवन है वैसे ही मानव को हम देवता कहते हैं। ऐसा नाम दिया है। शरीर छोड़ने के बाद देवता बनेंगे, शरीर के साथ भी देवता ही बने रहेंगे, ऐसा लिखा है। इसलिए आगे लिखा है -जागृत मानव कर्म करने में भी स्वतंत्र और फल भोगते समय में भी स्वतंत्र है। उसका अर्थ यही है मानव जो कुछ भी करता है, समझ के करेगा। अभी तक अपन यात्रा किए हैं कर के समझो में, इसीलिए हम झाँझर हो गए। करके समझने में हर व्यक्ति अपने ढंग से कल्पनाशीलता को दौड़ाया। उसमें सर्वाधिक अमानव चेतना काम किया, सर्वाधिक, राक्षस मानव पशु मानव के design में पूरा का पूरा प्रयत्न हुए,