वस्तु रह सकता है, विकास का प्रमाण नहीं हो सकता। ये सब न हों, जैसा जीवन हो गया, जीवन के रूप में कोई चीज़ जीवन की वैभव, वो सहअस्तित्व में ही प्रमाणित होगा। उसके लिए आगे चल कर के लिखा है हमने कि सहअस्तित्व नित्य प्रभावी, सदा प्रभावी, सदा- सदा के लिए प्रभावी है सहअस्तित्व। सहअस्तित्व नित्य प्रभावी होने के आधार पर जड़ चैतन्य के योग में ही चैतन्य का वैभव, जड़ का सीमायें स्पष्ट हो जाते हैं। ये बात को आगे चल कर स्पष्ट किया है। इस ढंग से शुभ कामना के पूर्ति के लिए इस बात को देखा समझा या शुभ कामना के पूर्ति के लिए ये सब दिखा, समझ में आ गया , उसको हम प्रकट किया है। प्रकट करने पर इसमे हमको लगता है, व्यवस्था में होने के लिए पूरा Project बनता है। पूरे का पूरा अभिव्यक्ति व्यवस्था है, हम शुरू किये हैं, भौतिकवाद व्यवस्था नहीं है, यहाँ से शुरू किए हैं। दोनों का अंतर् इतना ही है, वस्तुएँ होते हुए, दृष्टि में व्यवस्था नहीं है,भौतिकवाद ने यहाँ से शुरू किया, इसी को जोड़ते गए घटाते गए। हम जितने भी व्यक्त किया है- व्यवस्था है, दो अंश के परमाणु में भी, दो सौ अंश के परमाणु में भी व्यवस्था है। व्यवस्था होने के आधार पर निरंतर एक दूसरे के लिए व्यवस्था के प्रेरक हैं और पूरक हैं -इस बात को स्पष्ट किया। स्पष्ट करने के पश्चात् चैतन्य परमाणु जड़ प्रकृति से भिन्न हो गयी, गठनपूर्णता के आधार पर, चैतन्य प्रकृति भी जड़ प्रकृति के साथ ही अपना वैभव को व्यक्त करता है। कैसे? सहअस्तित्व नित्य प्रभावी होने के आधार पर।
व्यापक वस्तु, सम्पूर्ण जड़, चैतन्य प्रकृति के साथ ही अपने वैभव को प्रकट किया। ये न हों, वो प्रकट हो जाये ऐसा होता ही नहीं। वही हमारे बुज़ुर्गों ने लिखा है। व्यापक वस्तु ज्ञान रूप में अपने में अव्यक्त है और अनिर्वचनीय है। उस समय में शायद उतना ही लिखने की ज़रुरत रहा होगा, उतना ही लिखे हैं, या उनको समझ में नहीं आया होगा ऐसा भी हम सोच सकते है। जैसा जो सोचे, मेरे अनुसार सम्मान जनक भाषा यही है कि उस समय में उतना ही लिखना उचित समझा, उतना ही लिखा, उतना जिये, उतना प्रमाणित हुए, और आगे के लिए आशीर्वाद दे कर के गए, ऐसा मैं कहता हूँ।
जिज्ञासा: बाबा, चौथा बिंदु है सिद्धांत- श्रम, गति, परिणाम, इसको स्पष्ट करेंगे?
उत्तर: उसमे ये लिखा है आगे, ऊर्जा संपन्न होने के कारण, भीगे रहने से ऊर्जा संपन्नता, ऊर्जा सम्पन्नता का प्रकटन बल के रूप में, बल गति के रूप में, गति परिणाम के रूप में, परिणाम श्रम के रूप में, परिणाम और श्रम गति के रूप में प्रकट होता गया, अपने आप में। इसमें किसी Engineer का काम नहीं है, कोई बुद्धिजीवी का काम नहीं है, कोई नेता का काम नहीं है।
जिज्ञासा: बाबा जी तो इस सिद्धांत से सारी इकाइयां काम करती हैं?
उत्तर: हर इकाइयां स्वयं स्फूर्त काम कर रही हैं। हर वस्तु सत्ता में भीगा, डूबा, घिरा रहने से। भीगा रहने से ऊर्जा सम्पन्नता, डूबा रहने से क्रियाशीलता, घिरे रहने से नियंत्रण। तीन चीज़ आपको अध्ययन, बोध होता है। हर वस्तु, हर परमाणु अपने में नियंत्रित है, क्रियाशील है और बल संपन्न है। ये तीन बात अपने आपमें सबमें सम्पूर्ण रूप में दिखाई पड़ती है। यह बोध होने से सम्पूर्ण क्रिया स्वयं स्फूर्त है। कोई आदमी, जैसा हम पतंग को उड़ाते हैं, वैसे सबको