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भाग – 17
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जिज्ञासा: आपके विचारों में ये ईश्वरवाद और विज्ञान ने मानव को क्या दिया?
उत्तर: ईश्वरवाद ने रहस्य दिया, विज्ञान ने अपराध दिया। विज्ञान क्या दिया, अपराधी अपना छाती को हर दिन दो सेंटीमीटर मिलाने की विधि दिया और ईश्वरवाद ने दो सेंटीमीटर रहस्य में दबने के लिए विधि दिया, रहस्य में दबते जाओ, माने डूबते जाओ ये दिया, विज्ञान ने अपराध करते जाओ करते जाओ कहा। बहाल कर दिया अपराध को। और क्या चाहते हो? विज्ञान ने ये किया। इसका पहला प्रमाण क्या है? धरती के साथ अपराध। विज्ञान विधि से ही धरती के साथ अपराध हुआ। कोई विज्ञानी मानने को तैयार नहीं है, विज्ञान से ये हुआ, ये घोषणा करने की हिम्मत नहीं है। गला सूखता है, छाती फटती है, हृदय बैठ जाता है, हृदय स्पंदन बैठती है। तीनों काम होता है। विज्ञान युग के बाद ही धरती बर्बाद हुई। उसके पहले धरती में जंगल को बर्बाद करने की परम्परा थी, उसके पहले भी, वैदिक युग में भी धरती को मैदान बनाने की परम्परा थी। अभी भी ये जो बैगा जात है, ये आदिवासी जात है, इन लोगों के पुण्य कर्म में सवेरे उठ करके, आठ वर्ष के बाद के बच्चे कुल्हाड़ी फरसा ले जाकर कम से कम पाँच झाड़ काट कर आ जाते हैं।
जिज्ञासा: ये परंपरा तब से चली आ रही है?
उत्तर: आदि काल से, आदि मानव काल से, जब गुफा में रहता था, जब झोपड़ियों में रहता था, उस समय से चालू है। ये हो करके, ये चलते-चलते अभी हम यहाँ पहुँच गए हैं, अब जंगल ही नहीं है यहाँ आ गये। तब पता चला खनिज और वनस्पति संसार के संतुलित अवस्था में ऋतु संतुलन रहता है, ये हम को ज्ञान हुआ। तब पता चला, ये जंगल जितना होना चाहिए उतना ना होने से ऋतु असंतुलित होती है। खनिज जितना रहना चाहिये, वो ना रहने से ऋतु असंतुलित होती है। क्या हो गया? एक तो धरती बीमार हुआ ऋतु असंतुलित हो गया। सोने में सुगंधी हो गयी थोड़ा सा। पहले से ही करेला उसपे नीम चढ़ा। इस ढंग से हम इस प्रकार से फँस गए हैं, ना आगे जा पा रहे हैं ना पीछे लौट पा रहे हैं, ऐसी स्थिति में हम फँस गए हैं, दलदल में। अभी उसके लिए हम एक छोटा सा युक्ति निकाला, ऊर्जा संतुलन के लिए ये सब बातें ले जा सकते हैं। धरती के ऊपर जो उपज होता है उससे हमको ऊर्जा संतुलन करना चाहिए। और उसके साथ साथ वायु तरंग है, समुद्र तरंग है और सूर्य ऊर्जा है ये सभी चीज़ उपयोग किया जाए, उसके साथ सबसे ज़्यादा प्रवाह बल को प्रयोग किया जाए, इस पर हम बल दे रहे हैं। ये तो बात ऐसा हुआ ऊर्जा संतुलन की बात।
ऊर्जा संतुलन के बाद आता है ऋतु संतुलन। ऋतु संतुलन की बात आता है तो अभी हम ये कह रहे हैं, सभी किसान को कम से कम १०% जगह में जंगल लगाओ। व्यावहारिक बात है। क्यों लगाओ? घर में कोई ना कोई मरेगा ही, उसको जलाने के लिए लकड़ी तो चाहिए, सरकार देने वाला नहीं है। सरकार यदि करेगा तो यही करेगा, बिजली का