किया, कोई भी विज्ञानी इसका ज़िम्मेवारी स्वीकारने को तैयार नहीं। अब क्या करोगे? किसको ज़िम्मेवार ठहराया जाये? किंतु इसको उपयोग करने में हर मनुष्य कृत, कारित, अनुमोदित विधि से अपराधी हो चुका है। इसमें कोई आदमी बचा नहीं। इसको देखते हुए हर व्यक्ति कहीं ना कहीं अपराध के पक्षधर हुआ। इसीलिए इस अपराध का प्रायश्चित सभी कोई भोगने योग्य हुआ। फलस्वरूप क्या हुआ-प्रदूषण सबके लिए वरदान रूप में मिल गया। उसके बाद जो परेशानी आयी धरती बीमार हो गयी। अभी मुख्य बात, ये सब करतूत किया हमने अपराध कार्य, धरती के साथ जो अपराध किया उसके फलन में धरती बीमार हो गयी। बीमार हो गयी तो बुख़ार आ गया। बुख़ार आ गया तो हम लोग कहते हैं एक पान, एक काली मिर्ची, एक तुलसी का काढ़ा बना कर पी लो। आदमी ठीक हो जाता है, किंतु धरती को क्या पिलाया जाए। बड़ी मुश्किल की रोग। उसके लिए सोचा गया धरती के साथ पहले अपराध को तो छोड़ें। इसके साथ हम जितने भी अपराध कर रहे हैं तीन विधि से। विकिरणीय पदार्थ निकालना इसका उपयोग करना, ईंधनावशेष, pollution बनाता है। इसके साथ साथ जो परीक्षण करने के लिए भूमि के अंदर करते हैं, समुद्र में करते हैं, हवा में करते हैं इसका भी ईंधनावशेष, शेष रह जाता है। शेष रह करके पूरा का पूरा धरती को परेशान किया। तो ये सब तीनों मिलकर जब आ गयी है इसका practice छोड़ देने का अपना अपील है। इस अभ्यास को छोड़ें। कैसा छोड़ेंगे- सब को क्या बिजली नहीं चाहिए? पूछा जाए तो सभी को चाहिए, तो अपराध कर रहे हैं। अपराध सभी कर ही रहे हैं, इसी विधि से रोशनी चाहिए इस विधि से हम अपराधी हुए। हम उस जगह के हैं, हमारे खेत के मेढों में अरंड पैदा करते रहे, घर में हम तेल बना लेते थे। अरंडी का तेल- उसको शरीर में भी लगाते रहे, उसका दिया भी जलाते रहे। उस तेल को हम अभी छोड़ दिया, हमारा गाँव छोड़ दिया। हमारे गाँव में, हम लोग अभी गये थे, सबके घर में तो बिजली है। वहाँ एक बात की अवशेष मिला, वहाँ उस गाँव में वेद ध्वनि जीवित है कि नहीं जीवित है हम सशंकित थे। हम लोग गये तो पता चला कि वेद ध्वनि तो जीवित है। एक ही बात मिला है अभी, बाकी बात हम कहाँ देखा है। और बाकी बातों पर जाना शेष ही है। तो अभी बताया, हम लोग सन् चालीस तक रात्रि समय में अरंडी का तेल का दिया जलाते थे, उस के बाद मिट्टी का तेल आया, मिट्टी का तेल आने के बाद बिजली आयी। हम देखे ही हैं, ये बात ऐसा बनी हुई है। 

तो इस ढंग से घर-घर, गाँव-गाँव, आदमी-आदमी हर आदमी प्रकारांतर से अपराधी होता गया। तो हम लोग किसी भी प्रकार से पराधीन नहीं थे। रोशनी में हम स्वावलंबी, अनाज में स्वावलंबी, दूध में स्वावलंबी, दही में स्वावलंबी, घी में स्वावलंबी, कपड़े में स्वावलंबी। कैसे- हम लोग सूत कातते थे, और हमारे यहाँ जुलाहा बुनकर देते थे। हमारा खेत में जो होता था, वो पदार्थ उनको देते थे। पूरा गाँव देने के बाद हम अकेले में जितना होता था उससे ज़्यादा उनके पास हो जाता था। इसको हम लोगों ने जी कर देखा है, कर के देखा है, कोई परेशानी नहीं है। यदि अभी कहो हमारा गाँव में वही अरंडी का तेल में क्यों नहीं जीते हो, कहने पर कोई तैयार नहीं होगा। आदमी को बिजली ही चाहिए, इसमें ज्यादा सुविधा महसूस हुआ होगा तभी ना मनुष्य अपनाया है। इसको स्वीकारा जाए।

इस सुविधा को कैसे बनाया रखा जाए बिना धरती को घायल किए, ये बात आ गई। उसमें दो तीन उपाय निकल गए। एक प्रवाह बल नाम की चीज है, जिसको अभी तक उपयोग नहीं किया गया है। प्रपात बल को उपयोग किया, प्रवाह बल को उपयोग नहीं किया है। प्रवाह बल को उपयोग करने की technique develop किया जाए। 

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