बताओ ये क्या देकर के गए हमको। ये भी हो सकता है- मैं ही ऐसा करके मर गये हों, इसी के ऊपर बैठकर के मैं ही पूछते हों, ये भी हो सकता है, नहीं भी हो सकता है, इसके बारे में हम कह नहीं सकते। ये बताओ ये क्या दे गये हमको? कुछ नहीं दे गये। उसके बाद हमारा परिवार संसार को क्या दिया उसमें गए? कुछ नहीं दिया, सम्मान पाए, ये निकला। कितने लोग शोध करते हैं आप बोलो, इस शोध में ऐसा निकल गया- उसमें और घायल हो गए हम, होना ही है। उसके बाद हमने ये सोचा- हमारा परिवार जिस परम्परा में समर्पित है वो परम्परा क्या दिया? तब ईश्वरवाद आ गया। ईश्वरवाद इतना ही दिया- हर मनुष्य को रहस्य में दबो, दो-दो सेंटीमीटर हर दिन दबो, जब तक खाद ना हो, मट्टी ना हो, तब तक दबो। हमारा परिवार में बीसों आदमी दब के मरे। ये हमारे पास evidence है। बाक़ी को तो हम बताने जाते ही नहीं, हमारे परिवार परम्परा की बात करते हैं। पशु मानव बनाया ईश्वरवाद, भौतिकवाद राक्षस मानव बनाया। नमस्कार, प्रणाम। आगे चलो, बाकी इस कथन से कोई फायदा होने वाला नहीं। 

क्या दिया संसार को ईश्वरवाद- पशु बनने के लिए कहा और मर जाने के लिए कहा, दास बनने के लिए कहा, सब कुछ कहा। और विज्ञानवाद क्या दिया- राक्षस बनने के लिए कहा, सारा शिक्षा दिया राक्षस बनने के लिए। विधिवत् शिक्षा लेकर के राक्षस बना।

जिज्ञासा: मध्यस्थ दर्शन के अनुसार कला और साहित्य का क्या मतलब है? 

उत्तर: शिक्षा को पूरा का पूरा मानवीकरण करने के अर्थ में मानवीय शिक्षा संस्कार को निर्देशित किया। मानवीय शिक्षा संस्कार के अनुसार साहित्य के साथ तात्विक पक्ष का अध्ययन। तात्विकता का मतलब है सच। कला साहित्य में सत्य को उभारा जाए। सत्य को कला साहित्य के रूप में प्रस्तुत किया जाए। विज्ञान के साथ लिखा है चैतन्य पक्ष का अध्ययन। विज्ञान माटी पत्थर का अध्ययन कर लिया है और शरीर पक्ष को भी अध्ययन किया है, जीवन पक्ष को भी अध्ययन करे। ऐसा अनुरोध किया है।इससे  क्या प्रयोजन पूछने पर - अपराध से मुक्ति होगी। साहित्य में यदि तात्विक पक्ष को, सत्य को हम उभार पाते हैं, साहित्यकार अपराधी नहीं होगा। साहित्य सार्थक हो जाएगा। 

मनोविज्ञान के साथ संस्कार पक्ष का अध्ययन। संस्कार का मतलब होता है समझदारी, समझदारी पक्ष का अध्ययन कराया जाए। दर्शन शास्त्र के साथ क्रिया पक्ष का अध्ययन। दर्शन शास्त्र के साथ, जीने का गतिविधियों का अध्ययन कराया जाए। दर्शन के साथ शब्दों को नहीं पढ़ाया जाए, जीने की गतिविधियों को पढ़ाया जाए। समाजशास्त्र के साथ मानव तथा मानवीयता का अध्ययन कराया जाए। भूगोल और इतिहास के साथ मानवीयता को अध्ययन कराया जाए, मानवीय आचरण, व्यवस्था को अध्ययन कराया जाए। ये लिखा। इस ढंग से आठ बिंदुओं में ये सब अध्ययन कराया, वो सब बिलकुल सही विधि निकलती है। अभी तक तो उसमें कोई खामियां दिखी नहीं। इस ढंग से हम शुरू किए हैं। विज्ञान में राक्षसीयता को दूर करने के लिए और ईश्वरवाद के अनुसार पशुता को भी समाप्त करने के लिए हम इस प्रकार से शुरू किया। 

जिज्ञासा: बाबा जी कोई व्यक्ति, जिसका इस दर्शन से परिचय होता है और उसकी सहमति बनती है कि यह दर्शन जीवन को उन्नति की ओर ले जाएगा तो आप उसकी पूर्णता के लिए क्या सुझाव, मार्गदर्शन देना चाहेंगें? 

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