एक घर बनाएगा उसके अंदर एक box रखेगा उस box में शव को लेकर जल जाए करके रखो, उसको oven के अंदर कर देगा। उसमें बिजली on करेगा, वो जल करके ख़ाक होगा, ख़ाक लेकर के वापस लोटो। इससे यदि संतुष्टि होता हो तो ऐसा सरकार कर सकता है। सरकार लकड़ी तो नहीं दे पाएगी। तो उसके लिए क्या किया जाए? घर में कोई ना कोई मरेगा ही, अपने घर में मरे हुए आदमी का ईंधन तो हो। अपने चूल्हे के लिए ज़रूरत पड़ा उसके लिए सड़ा गला लकड़ी तो हो। इस प्रकार सोचकर के हर किसान अपना १०% भाग में जंगल लगाया जाए।
सत्य जी के समय में शिविर में ये जिक्र आ चुके थे, ऊर्जा संतुलन का। उस समय में हम लोग ये सब बात प्रस्तुत किये, उसमें जो रेंगा नहीं रेंगा होता ही है, ठीक है चलेगा, जो जितना रेंग गया वही बहुत है, नहीं रेंगता तो अपन क्या कर लेते, अपन तो मुकदमा चलाने वाले नहीं। अपन ये बीड़ा उठाएँ हैं, झगड़ा की जड़ अपन नहीं बनेंगे। झगड़ा करने की जगह में आते हो तो हम थोड़ी देर इंतजार करेंगे, थोड़ी देर बाद समझना। क्या जल्दी है।
जिज्ञासा: आपने कहा ईश्वरवाद ने रहस्य में मानव को दबाया। आज जो मानव भयभीत दिख रहा है क्या इसी का परिणाम है ये?
उत्तर: दबने के लिए कहा, अच्छे-अच्छे आदमी हर दिन दो दो सेंटीमीटर दबता गया, मर गया, खाद हो गया। उसके बाद विज्ञान आया, विज्ञान ने हर व्यक्ति को दिन में दस अपराध ज्यादा करो, धरती जल्दी खत्म हो, धरती से जिसके पास पैसा रहेगा उनको लेकर के हम दूसरे planet में भाग जाएं। बाकी सब यहीं मरे- ऐसा वो कह रहे हैं। यहाँ तक समझ में आ गया, इससे क्या मतलब निकला? (मानव अपराधी हुआ, अपराध से ग्रस्त हुआ) अपराध के प्रायश्चित को भोगने के लिए तैयार बैठा है। अब क्या किया जाए? अपराध करना यदि छूट जाए, प्रायश्चित कहीं ना कहीं अंत भी हो। अपराध करना यदि रुकता है, प्रायश्चित करने का भी range कहीं ना कहीं जा करके रुकेगा। ये estimation ठीक है ना? इसी estimation के आधार पर हम घंटी बजाना शुरू किए - तो अपराध मुक्ति कैसा होगा। अपराध मुक्ति के लिए कहा- ऊर्जा संत्तुलन के लिए उपाय बताया, व्यवस्था के लिए उपाय बताया, जीने के लिए उपाय बताया। क्या उपाय- समाधान, समृद्धि पूर्वक जीना है। समझदारी से समाधान, श्रम से समृद्धि- ये formula दिया।
जिज्ञासा: रहस्य की परिणीति क्या हुई मानव में?
उत्तर: मानव को दास बनाया, पशु मानव बनाया। हर दिन दो-दो inch दबाता गया, दब करके खाद हो गया। हमारा अकेले परिवार में दस बीस लोग अपने मरने के लिए गड्ढा कोड़ा अपने हाथ से, दूसरे से नहीं कुड़वाया, अपने हाथ से कोड़ा, उसके अंदर बैठ गया, मट्टी ढाँक लिया, मर गए। समाधि हो गए, समाधिष्ठ हो गए, और उसका चबूतरा बना, उसके बाद बोले उसका पूजा करो। मैंने एक दिन वो चबूतरा पर बैठा, हमारे बजुर्गों ने हमको बड़ी डाँट पिलायी, यहाँ जा करके बैठने का तुम्हारा क्या हक़ है। इसमें हक़ में क्या कमी है, मैं पूछा। तुम तो वितंडावाद करते हो बोले। हक़ में क्या कमी है, हम बैठ ही गया हूँ, हक में कम होता तो बैठते कैसे।