जिज्ञासा: ये प्रवाह बल का क्या आशय है?
उत्तर: अभी तुम किसी भी नदी में जाओगे, वह बहता है, उसका नाम है प्रवाह। उस प्रवाह में आपका पैर को धकेलता हुआ मिलता है, उसी को उपयोग करो। प्रवाह बल पर अपने को ध्यान देने की ज़रूरत है। हर प्रवाह में बल है। किस ओर प्रवाहित होता है उस ओर खींचने का बल है, ऐसे दिखता ही है। लकड़ी डालते हैं उसी ओर भागता है, उसका विपरीत दिशा में भागता नहीं है। ऐसा सभी नदी-नाला में देखा गया। तो इसको प्रवाह बल नाम दिया। उसको यदि हम ठीक ढंग से उपयोग कर पाते हैं, जैसे ब्रह्मपुत्र नदी चल रहे हैं, उस ब्रह्मपुत्र नदी अकेले में यदि एक हजार किलोमीटर में उपयोग किया जाए, ये भारत जैसे चार देश के लिए बिजली पूरी होता है। बाकी बिजली का तार का जाल तो बना ही है, आपको नया लगाना नहीं है। तो हज़ारों turbine चलेगी, उस सब को मिलाने की विधि है, उसको भेजने की विधि है, उसको वितरित करने की विधि है, ये सब में experts हो चुके हैं, ये engineering पढ़ा चुके हैं, धरती में ये कारीगरी तैयार हो चुकी है। तो आसानी से हम इस को कर सकते हैं।
उसके बाद आया हवा का तरंग। हवा तरंग समुद्र के किनारे ज़्यादा दिखती है। समुद्र के किनारे हवा तरंग को यदि उपयोग करना शुरू किये, जैसे- अभी रामेश्वरम में कुछ जगह में लोग अपने खेत में केवल हवा तरंग का उपयोग करते हैं उससे बिजली तैयार करते हैं अपने घर में तो जलाते ही हैं government को भी देते हैं, madras government को बैचते हैं। उसको अब केवल पूर्वी पश्चिमी समुद्र किनारे हवा तरंग से चलने वाली Dynamo के बारे में हमें अच्छी तरह से शोध करके वो install करने की ज़रूरत है। उसके लिए क्या है, ये जितना भी सड़ा-गला लोहा है सब उपयोगी है। जो अभी बताते थे जितना भी रेल पटरी के किनारे सड़ रहा है वो सब इसके लिए उपयोगी है। खम्बा तो खड़ा करना है, खम्बा के ऊपर एक तराज़ू रखना है। दोनो तरफ़ भार समान होना है, काँटे पर बैठा देना है, काँटे पर बैठा दिया तो पंखा घूमता रहता है। पंखा घूमता रहता है तो उसमें जो बल पैदा होता है, उस के आधा बल को किसी भी यंत्र को चलाने में उपयोग कर सकते हैं, उस विधि से उपयोग होता है। जितना बल उस पंखे में तैयार होता है हवा से, उसके आधे बल को किसी भी यंत्र में प्रयोजित कर सकते हैं। इस सिद्धांत से काम कर रहे हैं। तो इस प्रकार से ये काम कर रहे हैं, इस तरह हवा के तरंग से भी विद्युत ऊर्जा को पाया जा सकता है, वो already प्रमाणित है।
तीसरा बात है हर गाँव में गौशाला, गौशlला की व्यवस्था, गोबर गैस पैदा करना और जितने भी street lights हैं गोबर गैस से चलाना या सूर्य ऊर्जा से चलाना, और घर में रोशनी सूर्य ऊर्जा से। इतना प्रावधानित करना हो सकता है कि नहीं। ये जितना भी कबाड़ कारखाना कर रहे हैं, भ्रष्टाचार के नाम से कर रहे हैं यदि इसको बदल दें और यदि सद्बुद्धि हो, ये आराम से किया जा सकता है।
ये तीन ऊर्जा स्रोत हो गये। इन तीन ऊर्जा स्रोत से हम अच्छे तरह से, मुर्दा जलाने से लेकर लोहा गलाने तक पहुँचते हैं और मिट्टी जलाने से लेकर, चूल्हा जलाते तक पहुँचते हैं। चूल्हा भी जलाया जा सकता है और मिट्टी भी जलाया जा सकता है। इसी से आवागमन के लिए ईंधन हो गए। चाहे सूर्य ऊर्जा से बने चाहे प्रवाह बल से बने। इन दोनो से बनी हुई बिजली को हम गाड़ियों में उपयोग करने के लिए battery system बना लें। वो बैटरी २००, ४००, ५००, १००० किलोमीटर में बदलता है ऐसा arrange हो ही सकता है उतनी-उतनी दूर में depot बना लिया, वहाँ- वहाँ मिल जाएगा। अभी कर ही रहे हैं, गैस को तो कर ही रहे हैं। रायपुर में तो एक गैस भरने वाला center