आ ही चुका है। भिलाई में एक बैठने ही वाला है। ये सब बात बन ही रहा है। गैस को उपयोग करना ठीक है। अभी ईरान से जो गैस ला रहे हैं इसी विधि के लिए है। अभी आंध्रा में मुंबई से आयी हुई gas line जो है वहाँ एक power plant चला रहा है। आंध्र में पूरा power plant gas से ही चल रहा है। इस प्रकार से प्रयोग तो बहुत कुछ किए हैं, किंतु लाभोन्मादी विधि से। gas विधि से घूस खोरी भ्रष्टाचार कम हो जाएगी, सूर्य ऊर्जा विधि से कम हो जाएगी, हवा तरंग से ऊर्जा पैदा करने से कम हो जाएगी। ये सब पिचकाट जो है ना आदमी को अपने में सिर पैर के बिना बना रहा है। पिचकाट यहाँ का स्थानीय भाषा है जिसका अर्थ है खिच-खिच करना।
जिज्ञासा: बाबाजी, हम बात कर रहे थे जीव चेतना से मानव चेतना में आने के लिए मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान।
उत्तर: अभी हम बात किए जीव चेतना में हम धरती को तंग किया। मानव चेतना आने से धरती को तंग करना बंद होगी। उसका विकल्प आएगी। विकल्प का करीब-करीब प्रयोग हो चुका है, यदि नहीं हुआ होगा तो हो जाएगा।
उसके बाद आता है मनुष्य जो समझने का विधि है, ये समझने का विधि पठन विधि से हम करते हैं। प्रयोग विधि से, यंत्र विधि से हम विद्वान मानते हैं अभी। अभी तक यंत्र विधि से हम विद्वान मानते है और पठन विधि से विद्वान माना है। वेद कालीन से भी पठन विधि से ही विद्वान माना, अभी यंत्र विधि जुड़ा हुआ है। पठन और यंत्र के आधार पर हम विद्वान मान रहे हैं। उसके स्थान पर हम व्यवहार विधि से विद्वान को पहचानना शुरु करेंगे। इतनी ही बात। ये विकल्प है।
उसके बाद अध्ययन विधि में जाते हैं, जब अनुभव मूलक विधि से प्रमाणित होना बनता है। यह विकल्प है। अब उसके बाद व्यवहार विधि से हम जब प्रमाणित होना शुरू किया, हम व्यवस्था में होना पाया जाता है। व्यवस्था, सार्वभौम व्यवस्था सूत्र व्याख्या ही है। उस ढंग से सार्वभौम व्यवस्था में जीना आ जाता है। मानव समुदाय चेतना से मानव चेतना में परिवर्तित हो गया। सारा अपना-पराया का दीवार खतम हो गया, फलस्वरूप आदमी सुखी हो गया। इस ढंग से सर्वमानव सुखी होने की, शुभ होने की, निरंतर आनंदित रहने की, सुख शांति पूर्वक जीने की मार्ग प्रशस्त हो गया। इसका नाम है जीव चेतना से मानव चेतना में परिवर्तित होना। अभी भय से पीड़ित रहता है आदमी, शंका से पीड़ित रहता है, विरोध से पीड़ित रहता है, द्वेष से पीड़ित रहता है इस सब से मुक्ति पाने का दिन आता है, इसका नाम है मानव चेतना। इस ढंग से मानव चेतना की महिमा हमको समझ में आता है। उसमें परिक्षण करना अपने ही प्रयत्न से होगी दूसरे किसी से होगा नहीं। दूसरे किसी के करने पर हमारा तो होगा नहीं। इतना ही हो सकता है कि उन्होंने प्रमाणित किया है तो हम भी कर सकते हैं। ऐसा अस्मिता शुरू हो सकता है। इस ढंग से एक दूसरे के साथ प्रेरणा बनती है।