16
भाग – 16
👉 विडिओ संदर्भ देखें: Satsang Raipur Bhag-16
जिज्ञासा: बाबा जी मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान से आपका क्या आशय है?
उत्तर: मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान का मतलब है कि अभी हम जीव चेतना में जी रहे हैं, मानव चेतना में जीना चाहिए। मानव चेतना में जीना चाहिए ये तो उपदेश हुआ। मानव चेतना क्या है, कैसा है, कैसे हम मानव चेतना में सम्पन्न हो पाएँगे, इसको स्पष्ट किया है।
जिज्ञासा: पहले जीव चेतना क्या है इस को थोड़ा स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: राक्षस मानव और पशु मानव के रूप में जीना जीव चेतना है। राक्षस मानव का क्या मतलब है- नोचना, काटना, बगनखा लगाना यही राक्षस मानव का काम है, और पशु मानव का नाम है नोचवा लेना। उसी के साथ-साथ धरती को भी नोचना। धरती को भी घायल किया, ये राक्षस मानव नहीं तो क्या है। (हम तो उनको पूजा करते हैं) पूजा कर रहे हैं, फूल माला पहनाते हैं। इससे पता लगता है पशु मानव सदा-सदा क्रूरता को पूजा करता आया। क्या बताया- अभी तक यदि किसी का पूजा हुआ है, क्रूरता का पूजा हुआ।
जिज्ञासा: यदि धरती को घायल करके जो भी संसाधन निकाले गए हैं, यदि नहीं निकालते तो उसकी पूर्ति कैसे होती, संसार में विकास कैसे होता?
उत्तर: अभी उसी के ऊपर बात कर रहे हैं, ऊर्जा संतुलन। क्या है ऊर्जा संतुलन- चूल्हे में भोजन बनाना, लोहा गलाना, इसके लिए हमको ऊष्मा चाहिए। उसके बाद हमको जितने भी मुर्दा हैं, आदमी मर जाता है उसको जलाना है, मिट्टी को जला करके ईंट, पत्थर, मटका बनाना है, मिट्टी को जलाना और आदमी को जलाना, इसके लिए भी हमको ऊष्मा चाहिए है। ये हुआ चार पैर, इन चार पैर में ऊष्मा चाहिए। ये हमारा मानव परम्परा में practice में है। ये चाहत को तो हम पैदा कर दिया, उसके लिए खनिज तेल उपयोग किया, खनिज, कोयला उपयोग किया और विकिरणीय पदार्थों को उपयोग किया। इसमें से विकिरणीय पदार्थों को उपयोग किया उससे जो ईंधनावशेष हुई, खनिज तेल से जो ईंधनावशेष हुई, और खनिज कोयला से जो ईंधनावशेष हुई, वो सब प्रदूषण के रूप में मनुष्य को उपलब्ध हो गया। ये सब किस विधि से आयी? ये सब विज्ञानियों से बनाई। विज्ञानियों के विधि से आयी। ये सब