उत्तर: जब ऐसा स्वीकार हुआ, इसमें कोई सही बात है, सही बात कार्य व्यवहार में कैसे आएगा, इस बात पर तुला जाए। उसके लिए हम प्रस्तावित किए हैं- दर्शन, विचार, शास्त्र। उसको अध्ययन किया जाए, अध्ययन करने के बाद उसमें कोई चीज बचता है, उसको अच्छे ढंग से हमसे पूछ लिया जाए और अछोटी के विद्वानों से पूछा जाए, कानपुर के विद्वानों से पूछा जाए, मसूरी के, हैदराबाद के विद्वानो से, बिजनोर के विद्वानों से पूछा जाए। ऐसी कई जगह हो गयी वहाँ के विद्वानों से पूछा जाए। पूछ करके समाधान प्राप्त कर सकते हैं, यदि इनसे कोई मिला नहीं समाधान तो अमरकण्टक बैठा है। अमरकण्टक में इसका परंपरा रहेगी सम्पूर्ण प्रश्न का उत्तर देने का, प्रश्न मुक्ति कराने का परम्परा रहेगी। बाकी सब जगह में रहेगा। उसके साथ ये भी सोच रहे हैं, वहाँ आगे चल करके शिक्षक को तैयार करने की बात। उसका दो-तीन center पहचानेंगे। अंत में अंतिम बात अमरकण्टक में ही होगी। शिक्षक पूरा प्रमाणित हैं, इस बात को पहचानने की बात अमरकण्टक में रहेगी। ऐसा सोचे हैं। उसके लिए वहाँ एक center को बनाने की भी बात, ऐसा अभी सोचे हैं। वहाँ के विद्वान इस बात को निर्वाह करेंगे। 

जिज्ञासा: आपकी परिकल्पना कि धरती स्वर्ग हो सभी मानव देवता हों सब तरफ़ शुभ हो- दर्शन से जुड़ने से पहले ऐसा सम्भव नहीं लगता था परंतु जैसा-जैसा गति बनी है ऐसा होते हुए थोड़ा-थोड़ा दिखता भी है। तो कितने समय में ऐसा बन पाएगा? 

उत्तर: यही होना चाहिए, दिखता भी है। यही सही ठोर है। समय के बारे में हम बताना एक धृष्ठता जैसी होगी। अभी जैसा नियति विधि चल रही है, वो आदमी को इस ओर ध्यानाकर्षण करने के लिए ही है। अपना तैयारियाँ सही नहीं है, पूरा नहीं हुआ है। अभी जो हम जितने विद्वान जुड़े हैं, इनमें जो तैयारी होना चाहिए, उसमें कमी है। वो यदि पूरा होता है, मेरे अनुसार अभी तक पूरा हिन्दी संसार इसके भनक में आ जाना था, और इसमें सबका role है, वो शनैः-शनैः होगा, ऐसा मैं मान कर के चल रहा हूँ। हम किसी को उपदेश देने जाएँगे नहीं, हमको कोई उपदेश देकर के हम कुछ किया नहीं। मनुष्य अपने स्वयं स्फूर्त विधि से उपकार करना चाहेगा, उसके रास्ता है, इस बात की घंटी बजा रहे हैं हम। किस बात की घंटी बजा रहे हैं- यदि उपकार करना चाहेगा उसके लिए निश्चित विधि है, निश्चित ज्ञान है, निश्चित प्रक्रिया है, निश्चित फल परिणाम है- ये हम घंटी बजा रहे हैं। अभी ये पूरे बात के अर्थ में इतना ही है। इस प्रकार की छोटी सी काम किए हैं, और इस छोटे से काम से अपने को बड़ी संतुष्टि है, और इसको एक व्यक्ति के बाद दूसरे व्यक्ति तक जाने में हमको कोई हिचक नहीं है, कोई भी परेशानी नहीं है, कोई शर्म नहीं है, कोई कष्ट नहीं है, कोई विरोध नहीं है। हमारा विरोध करने की अभी तक कोई आवाज़ उठा नहीं। कम से कम तीस वर्ष से हम आदमी के साथ हैं। विरोध करने का कोई आवाज़ हमने सुना नहीं। हम क्या-क्या सुना? तुमको भाषा नहीं आता है, हमको स्वीकार है, हम आपको पढ़ा देते हैं। हमको आपका भाषा नहीं आता है, भाषा से जो होना है उसको हम पढ़ा देते हैं। हमको भाषा आने की जरूरत नहीं है, भाषा से क्या होना है वो हमको जरूरत है, उसमें हम पारंगत हैं। उनका कोई निरादर नहीं किया। उसके बाद आया तुम आशावादी हो। मैंने कहा कि निराशा का गोबर गड्ढा बताओ उसी में दब के मारा जाए। क्या निराशा में आप मरना चाहते हो? 

एक पाणिग्रही नाम का, पुलिस IG, हमारे पास, बैठ कर वो करीब दो दिन रहा, उन्होंने हमको आशावादी निरूपित किया। उनको हम क्या निरूपित किया- अपराध के पुलिंदे में तुम दब करके मर रहे हो, ऐसा मैं qualify किया।

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